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मां को भी चाहिए मी टाइम ‘अच्छी लगती है तेरी मासूम शरारतें, लड़खड़ाते क़दमों से चलकर मेरी ओर, अपनी तोतली भाषा में मुझे मां कहना, सुकून मिलता है तुझे सीने से लगाकर, तेरी हंसी से आती है मेरी चेहरे पर मुस्कान, तेरी ख़ुशी के लिए मंज़ूर है हर ़कुर्बानी मुझे. बस चाहती हूं चंद लम्हें ख़ुद को तलाशने, अपने वजूद को बनाए रखने के लिए ताकि तुझे भी फ़ख्र हो अपनी मां पर.’ हर मां के दिल में शायद यही जज़्बात होते हैं, त्याग और ममता की मूर्ति का लबादा पहनाकर हमेशा ही औरत/मां को ये एहसास दिलाया गया है कि उसके लिए परिवार और उसका बच्चा ही सब कुछ है. ये बात सच है कि हर मां के लिए उसका बच्चा सबसे पहले होता है बाकी सब कुछ बाद में, मगर इसके साथ ये बात भी सौ फीसदी सही है कि मां, पत्नी होने के साथ ही औरत का अपना भी अलग, अस्तित्व/पहचान होती है. उसकी भी कुछ इच्छाएं होती है, जो परिवार और बच्चों से अलग होती है. कुछ समय उसे अपने लिए भी चाहिए जब वो किसी की पत्नी, मां नहीं स़िर्फ मैं हो. आज की भाषा में जिसे मी टाइम कहा जाता है, उसकी ज़रूरत हर मां को होती हैं. हर दिन एक ही तरह के रूटीन से जब बाकी इंसान बोर हो जाते हैं तो क...
शादी के लिए लुक कितना मायने रखता है? लड़की कैसी लगी बेटा? मां बहुत अच्छी... अक्सर शादी के लिए लड़की देखने गए बेटे से मां का पहला सवाल यही होता है कि लड़की कैसी थी, मगर इस सवाल में कैसी का संबंध उसके बाहरी रूप, चेहरे से होता है और जवाब में अच्छी का ताल्लुक़ भी बस सुंदरता से ही होता है. कुछ अपवाद होना अलग बात है. हद तो ये है कि आज के पढ़-लिखे और ख़ुद को मॉर्डन कहने वाले ऐसे युवा जो ये कहते हैं कि उनके लिए स़िर्फ बाहरी सुंदरता मायने नहीं रखती, अपनी शादी की बात आते ही पलट जाते हैं. मैंने ख़ुद ऐसे कई लोगों को देखा है जिन्होंने उच्च शिक्षित और अच्छे पोस्ट पर काम करने वाली लड़की को स़िर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि वो उनके अच्छी वाले पैमाने पर फिट नहीं बैठ रही थी. कभी सांवला रंग, कभी लंबाई तो कभी मोटी कमर... ये सारी चीज़ें शिक्षा पर भारी पड़ जाती हैं. मेरे पड़ोस में रहने वाले एक जनाब वैसे तो डॉक्टर हैं, मगर उनके विचार किसी देहाती से बिल्कुल कम नहीं है, जब शादी की बात आई, तो जनाब ने कई पढ़ी-लिखी लड़कियों के रिश्ते रिजेक्ट कर दिए क्योंकि वो सुंदर नहीं दिखती थी, और हमेशा करियर ओरिएंटेड पत्नी की तलाश ...
मॉर्डन बहू बनाम तहजीब की चटनी ऊर्फ नकचढ़ी रेसिपी सिन्हा साहब बड़े ख़ुश थे। हों भी क्यों न, आख़िर बहुत ढूंढने पर उन्हें अपने कमांडर बेटे के लिए ख़ूबसूरत, पढ़ी-लिखी और बेटे के बराबर ओहदे वाली बहू जो मिल गई। स्मार्ट, शिक्षित, सुंदर। जब इतनी ख़ूबियों वाली बहू मिल जाए, तो किसी का भी ख़ुश होना लाज़मी ही है। सिन्हा साहब दोस्त-बिरादरी से लेकर रिश्तेदारों तक अपनी इस मॉर्डन बहू की तारी़फे करते नहीं थकते थे, मगर उन बेचारों को क्‍या पता था कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। चेहरे की सुंदरता और स्मार्टनेस का मतलब ये नहीं होता कि इंसान अंदर से भी ख़ूबसूरत होगा। शादी के चंद दिनों बाद ही मिस्टर सिन्हा की सारी ख़ुशियां काफूर हो गई, क्योंकि उनकी बहू मॉर्डन ज़रूर थी, मगर संस्कारों से उसका कोई सरोकार नहीं था। इकलौती बहू होने के कारण सिन्हा दंपती अपनी बहू से बहुत उम्मीदें लगाए बैठे थे। सबसे कहते फिरते की उनकी बेटी की कमी बहू ने पूरी कर दी। मगर उन्हें क्या पता था कि उनकी मॉर्डन बहू बेटी की कमी पूरी करना तो दूर उनसे उनका बेटा भी छीन लेगी। ऊंची हील और छोटी स्कर्ट वाली इस बहू को स़िर्फ और स़िर्फ अपने पति से मतलब था। छु...
कामकाजी माएं और बचपन से तरसता ममत्‍व..! 3 सालों का लंबा सफ़र जैसे पलक झपकते ही बीत गया।  लगता है कल ही की तो बात थी, जब मैं अपनी नन्हीं सी बेटी को गोद में उठाए उसकी मासूम मुस्कान पर मोहित होती रहती थी। उसके कोमल स्पर्श से मन पुल‍कित हो जाता था। उसी मासूम बच्ची को आज पहली बार स्कूल भेजते समय महसूस हुआ जैसे मैंने उसका बचपन ठीक से देखा भी नहीं और जिया भी नहीं।  कब मेरी गुड़िया इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला।  स़िर्फ 3 महीने की ही थी, वो जब मैंने दुबारा नौकरी ज्वॉइन कर ली, एक तरफ़ कॅरियर बनाने की महत्वाकांक्षा और दूसरी तरफ़ मां की ममता, बड़ी कश्मकश के बाद दिल को समझाया कि यूं ममता की रौ में बहने से काम नहीं चलेगा, बेटी को अच्छी परवरिश देनी है, तो आर्थिक रूप से मज़बूत बनना भी ज़रूरी है। मेरी बेटी अपनी दादी के हाथों स्नेह-दुलार में ज़रूर पलती रही, मगर मैं उसके नन्हें क़दमों की पहली आहट, उसका वो लड़खाड़कर चलना... सब मिस करती रही अब सोचती हूं तो याद ही नहीं आता है कि उसने पहली बार मां कब कहा था, उसने पहला शब्द क्या कहा था, वो पहली बार चली कब थी? जब कभी दूसरी मांओं के मुंह से ये सुनती मे...
क्‍या प्‍यार अंतरंग पलों में ही सिमट गया है? ‘तुम्हारे पास पूरे परिवार के लिए व़क्त रहता है बस मेरे लिए ही नहीं रहता, अब तुम मुझसे प्यार नहीं करती। कितनी बदल गई हो तुम!  तुम्हें पति की कोई परवाह ही नहीं है, तुम्हारी प्राइऑरटी लिस्ट में मेरा नंबर शायद सबसे आखिर में है’।  शादी के बाद, खासकर बच्चे के जन्म के बाद एक पति को अपनी पत्नी से अक्सर ऐसी ही शिकायत रहती है। मेरे पति को भी हैं, बगैर कुछ सोचे-समझे पति महोदय की उलाहनाओं की लिस्ट लंबी होती जाती है और मैं बेचारगी की स्थिति में कई बार ये सोचने पर विवश हो जाती हूं कि क्या सचमुच मैंने कोई गलती कर दी है?  मगर मैं करूं भी तो क्या? वक्त ने जिम्मेदारियों का इतना लबादा ओढ़ा दिया है कि कभी आइने के सामने घंटों संवरने वाली लड़की, अब खुद को ठीक से आईने में निहार भी नहीं पाती। जब मेरे पास खुद अपने लिए ही वक्त नहीं है, तो कैसे मैं नवविवाहिता/प्रेयसी की तरह तुम्हारे गले में बांहों का हार डाले बैठी रहूं? शादी के पहले तुम्हारे हाथों में हाथ डाले जब घंटों मैं बेफिक्र घूमती थी, तब मैं एक मां की दुलारी बेटी थी, हर जिम्मेदारी, चिंता-फिक्र ...
तुम और मैं नहीं, हम से घोले रिश्ते में प्यार की चाश्‍नी..! कभी बस स्टॉप, तो कभी समुद्र किनारे, कभी किसी बागीचे में फूलों के बीच एक गुलाब लिए जिसका इंतज़ार किया करते थे, आज वही गुलाब के कांटों की तरह क्यों चुभने लगा है?, जिसकी आंखों की शरारत और मधुर मुस्कान मर मिटने का मन होता था, आज उसकी हर बात में कड़वाहट क्यों नज़र आती है? कैसे बदल गए वो, कैसे बदल गई मैं? अक्सर फुर्सत के पलों में संजना अतीत की उन मधुर स्मृतियों में खो जाती, जिन्हें याद करके आज भी उसकी हिरणी जैसी आंखें शर्म से झुक जाती, मगर दूसरे ही क्षण वर्तमान का एहसास उसे दुखी कर देता। कभी अपने प्यार के लिए पूरे परिवार से दुश्मनी मोल लेने वाली संजना और नीरज ने 3 साल पहले लव मैरिज की थी। दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि वो कभी टिपिकल पति-पत्नी नहीं, बल्कि दोस्त की तरह रहेंगे, हर काम मिल बांटकर करेंगे। कुछ दिन तो सब ठीक रहा, मगर मर्द तो आख़िर मर्द ही होता है, वो भी हमारे भारतीय पुरुष, जिन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि बेटा घर के काम तेरे जिम्मे नहीं है, तुझे तो बस पढ़-लिखकर कमाना है (आजकल की आधुनिक माएं इसकी अपवाद ज़रूर हैं, मग...
मॉर्डनिटी की डींगे बनाम लड़के की चाहत..! डींगे हांकने के लिए होती हैं और मोह तो दिल को बाहर उछालने के लिए होता है, वो भी बल्लियों तक। अब मोह पैरों में मेंहदी लगाकर तो बैठता नहीं कि दिल में बस बैठा ही रहे। ऊपर से मोह यदि वंश बढ़ाने का हो और लड़का हो जाए, तो फिर क्‍या कहने! ऐसा उछाले मारना शुरू करता कि उस उछाल के क्‍या कहने! दिल बल्लियों उछलता है और डींगों को हांकने लायक छोड़ देता है। डिंगों की बड़ी किरकिरी होती है। अब देखिए न!  वर्मा जी के यहां लड़का हुआ, तो उनका दिल बल्लियों उछला, इतना कि पहली बार जब वे दादा बनें तो भी न उछला था। भई पोता जो हुआ था। उनके वंश को बढ़ाने वाला। अब भले ही वे प्रोफेसर थे और स्‍त्री मुक्ति और पितृसत्‍तात्‍म्‍क समाज पर गजब लिखते और बोलते थे। यही हाल उनकी कार चलाने वाली पत्‍नी सामाजिक कार्यकर्ता मिसेज वर्मा का भी था। हालांकि ये और बात है कि जब पहले उनके बेटे को दो लड़कियां हुईं थी, तो उन्‍होंने नई नवेली दुल्‍हन की तरह ही रिएक्‍शन दिया था। ओह! विनीत को लड़की हुई है..! मिस्‍टर वर्मा और मिसेज वर्मा की लड़के और लड़की में भेद करने की डींगे हांकने वाली ही रहीं और उनका...
तो क्‍या इन लोगों ने बनाया एक सामान्‍य महिला को राधे मां?   राधे-राधे जपो चले आएंगे बिहारी..!  अब शायद लोग राधे-राधे जपने से पहले भी सौ बार सोचेंगे, कहीं ऐसा करने से उन्हें भी राधे मां का भक्त न मान लिया जाए। इन दिनों राधे मां पूरे देश के लिए हॉट टॉपिक बनी हुई हैं, और हो भी क्यों न लाल रंग में लिपटी वो हमेशा ख़ुद को यही तो दिखाने की कोशिश करती हैं। लाल रंग भक्ति या श्रद्धा का रंग नहीं है ये तो आप भी जानते ही होंगे। वैसे हाथ में त्रिशूल, उंगलियों में डिज़ाइनर रिंग, गले में चमचमाते हार, होठों पर लाली, भारी-भरकम लाल परिधान पहने अपने चेले-चपाटों से घिरी नाज़ो-नख़रे करते धीमे-धीमे क़दम बढ़ाती चलती राधे मां के जलवे किसी महारानी से कम नहीं हैं। नख से लेकर शिख तक लाल रंग के परिधान और मेकअप में डूबी हुई राधे मां अब सचमुच में देवी का अवतार हैं या नहीं इसका फैसला तो वे ही करें जो उनके भक्‍त हैं, मगर इतना तो है कि उनमें गजब की शक्ति व आकर्षण है, तभी तो एक से एक नामचीन लोग भी उनकी भक्तों की लिस्ट में शामिल हैं। एक साधारण महिला, जिसे शायद ठीक से बोलना भी नहीं आता, तभी तो लाल परी राधे मां ...
..तो इस चीज का नशा था ‘इंद्राणी’ को..? कुछ साल पहले एक चौदह वर्षीया लड़की (आरुषि) की निर्मम हत्या का मामला सामने आने के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी। हर किसी की ज़ुबां पर इस हत्याकांड के चर्चे थे, वो इसलिए नहीं था कि ये हमारे देश का कोई पहला हत्याकांड हो, बल्कि इसलिए था क्योंकि इसमें हत्या का दोषी कोई और नहीं, बल्कि लड़की के अपने माता-पिता थे। अब वे वाक़ई दोषी हैं या नहीं ये, तो आज भी राज बना ही हुआ है हालांकि हैं फिलहाल दोनों जेल में। इस हत्याकांड के सामने आते ही सबसे विश्‍वसनीय माना जाने वाला बच्चे और मां-बाप का रिश्ता ही सवालों में घिर गया। क्या कोई माता-पिता अपनी ही औलाद को यूं मार सकते हैं? अब कई सालों बाद एक बार फिर यही बहस शुरू हो गई है। ताज़ा मामला है शीना बोरा हत्याकांड का है, जिसकी गुत्थी मकड़ी के जाले से कम उलझी हुई नहीं है। इस केस ने तो सारे रिश्तों चाहे वो पति-पत्नी का हो या मां-बेटी का सबकी विश्‍वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यकीनन मां जो बच्चे की सरंक्षक होती है, अगर वही उसकी दुश्मन बन जाए, तो भला वो इस दुनिया का सामना कैसे करेगा? हमारी संस्कृति में मां को ...
साड़ी पहनना सभ्‍यता है और शॉर्ट स्‍कर्ट..? आज सुबह रोज़ाना की तरह लोकल ट्रेन में दो महिलाओं की आपसी बातचीत हो रही थी,  तभी शॉर्ट ड्रेस पहने एक सुंदर सी लड़की उनके सामने आ गई।  उसे देखते ही दोनों अधेड़ उम्र महिलाएं उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगी। दरअसल, वो उसकी छोटी स्कर्ट के नीचे से झांकती ख़ूबसूरत टांगों को देखकर चिढ़ भी रही थी, कि हाय! कितनी सुंदर है और बदन दिखाने के लिए आपस में मिलकर उसे कोस भी रही थी - आजकल की लड़कियों को कपड़े पहनने का ढंग ही नहीं है, पता नहीं शरीर ढंकने के लिए कपड़े पहनती हैं या दिखाने के लिए? अब ऐसे कपड़े पहनकर सड़क पर निकलेंगी तो लड़के छेड़खानी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे? काफ़ी देर तक ये दोनों मोहतरमा इसी तरह उस लड़की के पहनावे का पोस्टमार्टम करती रहीं। दिलचस्प बात तो ये रही कि उस लड़की को बदन दिखाने के लिए कोसने वाली दोनों महिलाओं कहने को तो साड़ी पहनी थी, मगर डीप नेक ब्लाउज़ और बेतरतीब ढंग से पहनी साड़ी में उनका बदन भी ढंका कम ही था, मगर चूंकि उन्होंने साड़ी पहनी है, इसलिए वो सभ्य हैं। इन महिलाओं की बातें सुनकर मुझे हैरानी नहीं हुई, क्योंकि अक्सर इस तरह की बातें...
सिंदूर, बिंदी और मंगलसूत्र का मोहताज नहीं है पत्‍नी का रिश्‍ता..!   मांग में सिंदूर भरे माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाए, पायल छमकाती मिसेज खन्ना अपनी पड़ोसन से शिकायत करने पहुंची थी। अपनी नई नवेली देवरानी की। दरअसल, मिसेज़ ख़न्ना उन महिलाओं में से हैं जिनके लिए रिश्ते निभाने का मतलब है उससे जुड़ी हर मान्यता, रीति-रिवाज़ और निशानियों को तहे दिल से मानना। हालांकि ऐसा नहीं है कि वो शिक्षित नहीं हैं। मिसेज़ ख़न्ना ग्रैज्युएट हैं, मगर पत्नी धर्म के मामले में उनकी राय किसी भी 70-80 साल की बुज़ुर्ग महिला से अलग नहीं है, जिनके लिए पति परमेश्‍वर हैं और उस परमेश्‍वर का नाम लेना भी गुनाह है। उन्हें तो बस ऐजी, ओजी, सुनिए जी या फलां के पापा जैसे संबोधनों से ही बुलाया जा सकता है। अन्यथा भगवान नाराज़ हो जाएंगे। ये बातें आज की मॉर्डन महिलाओं को बहुत बचकानी लग सकती हैं, मगर ये सच हैं। हां, तो बात हो रही थी मिसेज़ खन्ना की, जो अपनी नई-नई देवरानी के चाल-चलन से दुखी थीं। हुआ यूं कि उनकी देवरानी प्रिया एमबीए थी और मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत थी, शादी के बाद भी बाक़ायदा उसने नौकर...

प्यार का एहसास

लाहौर की गलियों में, इस्लामाबाद की सड़कों पर कश्मीर की वादियों में ढ़ूढ़ता फिर रहा हूं तुम्हें न जाने कहा छिपी है तू तेरी याद को दिल में संजोए हुए हूं आंखों में बसी है सूरत तुम्हारी दूर होकर भी हर पल पास  रहती हो मेरे मेरी अंधेरी रातों के क्या कभी होंगे सवेरे जाने कैसा रिश्ता है तुमसे दिल समझ नहीं पाया, तो दुनिया को क्या समझाएं नहीं मिला तुम्हारा साथ तो क्या तेरे प्यार का एहसास तो है साथ.

काम और बस काम...

काम काम और बस काम... इस काम ने कर दिया हैं जीना मुहाल सुबह से रात तक बस दिखता है काम सुकून और चैन का न लो तुम नाम लोग कहते हैं हम बने ही करने के लिए काम कोई पूछे उनसे क्या हम नहीं हैं इंसान? क्या हमे नहीं चाहिए कुछ पल का आराम? ऑफिस के सिवा भी है एक दुनिया हमारी क्या उसकी जिम्मेदारियां निभाना नहीं हैं हमारा काम?

सवालों का सिलसिला

भावहीन हो गयी है कविता, सारहीन गया है साहित्य उद्देश्यहीन हो गयी पत्रकारिता और अर्थहीन हो गया है जीवन क्या ये असर है विकास की अंधी दौर का? या नतीजा है दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ने की होड़ का? जज़्बात, प्यार, भावनाएं, विचार सिमट गये हैं बस शब्दों में खलती है अब इनकी कमी जिंदगी में क्या शोहरत की शोहबत ने कर दिया है क़त्ल हमारी संवेदनाओं का या झूठी कामयाबी के खुमार में गुम हो गया असल मकसद जिंदगी का? क्या यूँ ही जारी रहेगा सवालों का सिलसिला? या मिलेगा कभी जवाब इनका?
किसके लिए संजोते हो सपना , दुनिया की इस भीड़ में नहीं होता हैं कोई अपना. देंगे दगा वही जिसे दिल में बसाते हो, करेंगे रुसवा वही जिनके लिए खुशियाँ जुटाते हो. तुम पर नहीं, तुम्हारी शोहरत पर झुकते हैं लोग. जो गिरोगे एक बार, तो रौंद कर निकल जायेंगे आगे . भावना, प्यार, सम्मान का नहीं हैं यहाँ कोई मोल. बस पैसो में तौले जाते हैं यहाँ रिश्तों के डोर.

रटे रटाए जुमले

गुनहगारों को बख्शा नहीं जाएगा, हम पड़ोसी मुल्क को चेतावनी देते हैं, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी ये कुछ ऐसे रटे रटाए शब्द हैं जो तकरीब़न हर राजनेता की ज़ुबान पर रहता है। लेकिन कोई ज़रा उनसे पूछे कि मात्र जनता के बीच स्टेज पर जाकर ऐसे ऐलान और चेतावनी देनें से क्या होने वाला है? अगर इनकी चेतावनियों में ज़रा भी दम होता अगर वाक़ई ये हालात के प्रति गंभीर होते तो दिनों दिन अपराधियों की हिम्मत बढ़ी नहीं होती। कोई नेता किसी दलित का बलात्कार करने की हिमाकत न करता, दिन दहाड़े तेज़ाब फेंकने, छेड़छाड़ और रेप के मामले नहीं बढ़ते। पड़ोसी मुल्क हमारी धरती पर आतंक का तांडव रचकर हमें ही ललकारने का दुस्साहस न करतें. इतना सब होते हुए भी हमारे नेताओं को रटे रटाए बरसो पुराने जुमले पढ़ने में शर्म नहीं आती। कोरे वादे करके उन्हें लगता है कि उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई. अगर ऐसा ही चलता रहा तो हालात और भयावह हो जाएंगे.

जिंदगी

हर पल हर घड़ी एक सवाल हैं जिंदगी, कुछ अनसुलझे सवालो से परेशां हैं जिंदगी , इसकी अपनी नहीं हैं कोई बिसात, बस वक़्त की गुलाम है जिंदगी।
ना कोई आचार है ना कोई विचार है जाने कैसा ये संसार है ना सत्‍य की पहचान, ना है असत्‍य का ज्ञान इन्‍हे ते बस चलानी है खबरों की दुकान चौथे स्‍तंभ का मिला है जिसे दर्जा आज खोखली हो गई उसकी ही बुनियाद है

इंतहा

इंतहा हो गई इम्तिहान की, कदर नहीं इस जहां में इसांन की काम करने वालों की नहीं, हुकूमत चलती है यहां कामचोरों की मर चुका है जमीर जिनका, वो क्या जाने अहमियत स्वाभिमान की मुफ्त में मिल गया है नाम जिनको, वो क्या जाने कीमत मेहनत की झूठी शान के है जो दिवाने, वो क्या जाने हकीकत जिंदगी की हर सीमा को लाघ चुके हैं जो, वो क्या जाने हदे इंसानियत की हद होती है हर बात है कि, मगर इंतहा नहीं इनकी चापलूसी भरी बात की

सवालों की लहर

जिंदगी के समंदर में उठती है सवालों की लहर जब मन में हलचल मच जाती है तब देखकर हर तरफ झूठ का अंधेरा अशांत हो जाता है मन और फिर उठ जाती है सवालों की एक लहर.... आखिर कब खत्म होगा फरेब का खेल और जीवन में आएगी सच की रोशनी क्या कभी होगी जीत इंसानियत की विश्वास, सम्मान, सत्य, सहयोग की अहमियत लोग समझेंगे कब? फिर खड़ी हो गई सवालों की एक नई लहर, लेकिन हर बार की तरह लौट गई मन के किनारों से टकराकर