खामोशी
अब तो चुप्पी तोड़ो, ख़ामोश क्यों हो? कुछ तो बोलो, लुट रहा है देश खुलेआम, बिना रिश्वत के नहीं होता यहां कोई काम, भ्रष्टाचारियों ने डुबो दी है देश की शान, ठगा सा महसूस कर रहा है आम इंसान, हाय! किस पर करूं मैं विश्वास. दो वक़्त की रोटी मुश्किल हो गई है गरीबों की और तिजोरी भरती जा रही अमीरों की. घोटालों की घुटन में कहीं घुट न जाए देश, इसलिए अब तो मन को टटोलो जी अब तो कुछ बोलो मनमोहन जी.