Monday, September 21, 2015

मॉर्डनिटी की डींगे बनाम लड़के की चाहत..!


डींगे हांकने के लिए होती हैं और मोह तो दिल को बाहर उछालने के लिए होता है, वो भी बल्लियों तक। अब मोह पैरों में मेंहदी लगाकर तो बैठता नहीं कि दिल में बस बैठा ही रहे। ऊपर से मोह यदि वंश बढ़ाने का हो और लड़का हो जाए, तो फिर क्‍या कहने! ऐसा उछाले मारना शुरू करता कि उस उछाल के क्‍या कहने! दिल बल्लियों उछलता है और डींगों को हांकने लायक छोड़ देता है। डिंगों की बड़ी किरकिरी होती है।
अब देखिए न!  वर्मा जी के यहां लड़का हुआ, तो उनका दिल बल्लियों उछला, इतना कि पहली बार जब वे दादा बनें तो भी न उछला था। भई पोता जो हुआ था। उनके वंश को बढ़ाने वाला। अब भले ही वे प्रोफेसर थे और स्‍त्री मुक्ति और पितृसत्‍तात्‍म्‍क समाज पर गजब लिखते और बोलते थे। यही हाल उनकी कार चलाने वाली पत्‍नी सामाजिक कार्यकर्ता मिसेज वर्मा का भी था। हालांकि ये और बात है कि जब पहले उनके बेटे को दो लड़कियां हुईं थी, तो उन्‍होंने नई नवेली दुल्‍हन की तरह ही रिएक्‍शन दिया था।
ओह! विनीत को लड़की हुई है..!
मिस्‍टर वर्मा और मिसेज वर्मा की लड़के और लड़की में भेद करने की डींगे हांकने वाली ही रहीं और उनका वंश बढ़ाने का मोह हर तरह की मॉर्डनिटी से हार गया।
अब देखिए न! हाल ही में मुझे अपनी एक दोस्त के मां बनने की ख़बर मिली। हालांकि ये उसका दूसरा बच्चा था!  मगर परिवार वालों की ख़ुशी और उतावलापन देखकर मैं हैरान थी। सबके सब ऐसे ख़ुश हो रहे थे, मानों उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो। मैं ये नहीं कह रही कि दूसरे बच्चे के जन्म पर ख़ुशियां नहीं मनानी चाहिए,  मैं तो बस ये समझने की कोशिश कर रही हूं कि समानता की बात करने वाली आज की युवा पीढ़ी भी लड़के-लड़कियों में फर्क़ कर ही देती है, तभी तो आज से 4 साल पहले जब मेरी दोस्त को लड़की हुई थी, तब परिवार में सबका चेहरा मायूसी से लटका हुआ था। वो बच्ची परिवार का पहला बच्चा था, सो सबको ख़ुशी से उसका स्वागत करना चाहिए था, मगर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि बाद में सब उस बच्ची से बहुत प्यार करने लगे, मगर उनके दिल के कोने में लड़के की चाहत बरक़रार रही।
 ‘अरे भई वंश बढ़ाने वाला कोई तो चाहिए, लड़की तो अपने घर चली जाएगी तब बुढ़ापे में कौन हमारी देखभाल करेगा,’ ये किसी बुज़ुर्ग महिला/पुरुष के विचार नहीं है, बल्कि मेरी दोस्त के पति जो ख़ुद प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर और आधुनिक युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका है।
हम आधुनिकता की कितनी भी डींगे हांक लें, लेकिन ये कड़वा सच है कि कुछ अपवादों को छोड़कर आज भी लोग बेटे की ही चाहत रखते हैं। सिंगल चाइल्ड के इस दौर में जहां काम की व्यस्तता और बढ़ते ख़र्च की वजह से जब कपल्स एक ही बच्चे को प्राथमिकता दे रहे हैं, यहां भी विरोधाभास ही नज़र आता है। यदि किसी दंपती को पहला लड़का हो गया फिर तो ठीक है, मगर पहली यदि बेटी हो गई, तो उन्हें सेकंड के बारे में सोचना पड़ता है। अगर कभी पत्नी दूसरा बच्चा न भी चाहे तो पति या परिवार वाले मानसिक रूप से उस पर दबाव बनाने लगते हैं, क्योंकि वर्किंग/शिक्षित बहू पर पहले की तरह शारीरिक जोर-ज़बर्दस्ती करना तो अब संभव नहीं रहा, लेकिन मानसिक तौर पर तो परेशान किया ही जा सकता है।
मुझे ताज्जुब तो इस बात का है कि ख़ुद आज के युवा अपने माता-पिता का ख़्याल नहीं रख रहे और उम्मीद करते हैं कि बेटा रहेगा तो उनका बुढ़ापा सुरक्षित रहेगा। लगता है ये लोग, ‘बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होए’ वाली कहावत भूल चुके हैं। ज़रा कोई इनसे पूछे कि भई जब तुम पैदा हुए होगे तो तुम्हारे मां-बाप ने भी तो ऐसा ही सोचा होगा न कि मेरा बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा, तो आज क्यों उन बेबस मां-बाप को अपने हाल पर अकेला छोड़ दिया। कुछ बच्चे तो बेझिझक माता-पिता को वृद्धा आश्रम छोड़ आते हैं, अगर आप अपने आसपास नज़र दौड़एंगे तो ख़ुद ही ऐसे ढरों उदाहरण मिल जाएंगे, जहां बेटा ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी रहा है और उसके लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान करने वाले माता-पिता बस किसी तरह अपनी ज़िंदगी के दिन काट रहे हैं।
मैं ये नहीं कहती कि सब बेटे एक जैसे होते हैं, मगर ज़्यादातर का हाल यही है, और जहां तक लड़के-लड़कियों का सवाल है तो पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों की ज़रूरत पड़ती है। बेटे की चाह रखने वालों से ज़रा पूछा जाना चाहिए कि अगर कोई बेटी पैदा ही न करे, तो भविष्य में आपके आंगन में बहू कैसे उतरेगी?  धूमधाम से किसके घर अपने बेटे की बारात ले जाओगे, बिना स्त्री के क्या किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?  शायद नहीं। मगर इतनी अहम् होने के बावजूद आज भी वो दोयम दर्जे की ही कहलाती है।
चाहे आईएस की परीक्षा हो, या कोई अन्य परीक्षा, लड़कियां कहीं भी लड़कों से पीछे नहीं है, तो जब हर जगह वो लड़कों की बराबरी कर सकती है, तब समाज क्यों नहीं उन्हें बराबर का दर्जा देता? क्यों लड़की होने पर किसी बहू को दूसरा बेटा पैदा करने के लिए मजबूर किया जाता है। वंश चलाने के लिए बेटा ज़रूरी है, ये तर्क देने वाले लोग क्या ये बता सकते हैं कि क्या अकेले बेटा ही उनका वंश चला लेगा बिना बहू के? आज के ज़माने में बेटियां बेटों से कम थोड़े ही हैं, स़िर्फ ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा, अगर सचमुच आप उन्हें बराबर मानते हैं, तो उनके जन्म पर भी वही ख़ुशी व उत्साह दिखाइए जितनी बेटे के जन्म पर दिखाते हैं।

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