तो क्या इन लोगों ने बनाया एक सामान्य महिला को राधे मां?
राधे-राधे जपो चले आएंगे बिहारी..! अब शायद लोग राधे-राधे जपने से पहले भी सौ बार सोचेंगे, कहीं ऐसा करने से उन्हें भी राधे मां का भक्त न मान लिया जाए। इन दिनों राधे मां पूरे देश के लिए हॉट टॉपिक बनी हुई हैं, और हो भी क्यों न लाल रंग में लिपटी वो हमेशा ख़ुद को यही तो दिखाने की कोशिश करती हैं। लाल रंग भक्ति या श्रद्धा का रंग नहीं है ये तो आप भी जानते ही होंगे। वैसे हाथ में त्रिशूल, उंगलियों में डिज़ाइनर रिंग, गले में चमचमाते हार, होठों पर लाली, भारी-भरकम लाल परिधान पहने अपने चेले-चपाटों से घिरी नाज़ो-नख़रे करते धीमे-धीमे क़दम बढ़ाती चलती राधे मां के जलवे किसी महारानी से कम नहीं हैं।
नख से लेकर शिख तक लाल रंग के परिधान और मेकअप में डूबी हुई राधे मां अब सचमुच में देवी का अवतार हैं या नहीं इसका फैसला तो वे ही करें जो उनके भक्त हैं, मगर इतना तो है कि उनमें गजब की शक्ति व आकर्षण है, तभी तो एक से एक नामचीन लोग भी उनकी भक्तों की लिस्ट में शामिल हैं।
एक साधारण महिला, जिसे शायद ठीक से बोलना भी नहीं आता, तभी तो लाल परी राधे मां हमेशा बड़ी-सी झूठी मुस्कान के आवरण से अपनी अज्ञानता छिपाने की कोशिश में लगी रहती हैं। वैसे एक बात तो है ये राधे मां जितनी बड़ी ड्रामा क्वीन है, हमारे देशवासी उतने ही बड़े मूर्ख हैं। समझ नहीं आता कि मेकअप से पुती इस महिला में उन्हें कैसे और कहां से देवी का अवतार नज़र आता है? आख़िर उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि लोग अपने आंख-कान और दिमाग़ बंद करके उसके पीछे हो लिए?
अब तक टीवी पर जितनी बार भी माता जी ने दर्शन दिए, कहीं से वो साधु-संत या देवी का आभास नहीं कराती हैं। बाकी ढोंगी बाबाओं ने तो चलो अपने बोलबचन से लोगों को अपने वश में किया या मूर्ख बनाया, मगर ये मैडम तो उनसे कहीं आगे निकल गई। बिना बोले स़िर्फ अपनी फरेबी मुस्कान की बदौलत उसने अपने इतने भक्त बना लिए कि उनके चढ़ावों ने ग़रीब सुखविंदर कौर को करोड़पति राधे मां बना दिया। सचमुच ग़जब का हुनर है इनमें। वैसे इनसे ज़्यादा तारीफ़ के क़ाबिल तो इनके वो भक्त हैं, जो आंखें होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करते। हाथ में त्रिशूल लेकर पागलों की तरह नाचना, गहनों से लदे रहना, आशीर्वाद के नाम पर किसी की गोद में चढ़ जाना या किसी को गले लगाना... भला भक्ति का ये कौन-सा रूप है?
साधु-संत तो भोग-विलास से कोसो दूर प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं, मगर ये मां तो विलासिता की जीती-जागती मिसाल है। हमारे देश कि ये विडंबना ही है कि ख़ुद को महाशक्ति और आधुनिक बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद हम अंधविश्वास की मज़बूत पकड़ को ढीली नहीं कर पाए हैं। आज भी अंधविश्वास की जड़े इतनी गहरी तक जमी है कि उसे निकाल पाना सरकार और प्रशासन के बस की बात नहीं। जब भी किसी तथाकथित धर्म गुरु का पर्दाफाश होता है तो उसकी गिरफ्तारी की राह में उसके भक्त दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। आशाराम और संत रामपाल मामला इसकी मिसाल रहे हैं।
दरअसल, हमारे देश में इन बाबाओं की दुकानों के फलने-फूलने का स्वार्थ, अंधविश्वास, लोगों में आत्मविश्वास की कमी, सब कुछ जल्दी पा लेने की चाह, मेहनत किए बिना सब पा लेने की ख्वाहिश... सब ज़िम्मेदार है। आप ही बताइए अगर आप और हम किसी भी ऐरे-गैरे को देवी, भगवान का अवतार मानना बंद कर दें, तो क्या वो इतना मशहूर हो सकता है? आशाराम, रामपाल, निर्मल बाबा, राधे मां और इनके जैसे और न जाने कितने ढोंगी संत हर गली-कूचे में पनपते रहते हैं। इनकी वेबसाइट बनाकर बक़ायदा इनका गुणगान किया जाता है इनका बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए आपसे दान के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं, इनके आशीर्वाद के लिए ऑनलाइन बुकिंग होती है।
अब बताइए, क्या भगवान इतने सस्ते हो गए हैं कि उन्हें भी ऑनलाइन मार्केटिंग की ज़रूरत पड़ गई? जब तक हम और आप इन जैसे लोगों के झांसे में आते रहेंगे तब तक राधे मां और आसाराम जैसे लोगों की नई जमात तैयार होती ही रहेगी। एक जाएगा तो दूसरा आएगा, क्योंकि इनके जैसे ढोंगियों को पनपने के लिए हमारे पास अंधविश्वास और स्वार्थ का खाद पानी जो है।
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