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काम और बस काम...

काम काम और बस काम... इस काम ने कर दिया हैं जीना मुहाल सुबह से रात तक बस दिखता है काम सुकून और चैन का न लो तुम नाम लोग कहते हैं हम बने ही करने के लिए काम कोई पूछे उनसे क्या हम नहीं हैं इंसान? क्या हमे नहीं चाहिए कुछ पल का आराम? ऑफिस के सिवा भी है एक दुनिया हमारी क्या उसकी जिम्मेदारियां निभाना नहीं हैं हमारा काम?

सवालों का सिलसिला

भावहीन हो गयी है कविता, सारहीन गया है साहित्य उद्देश्यहीन हो गयी पत्रकारिता और अर्थहीन हो गया है जीवन क्या ये असर है विकास की अंधी दौर का? या नतीजा है दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ने की होड़ का? जज़्बात, प्यार, भावनाएं, विचार सिमट गये हैं बस शब्दों में खलती है अब इनकी कमी जिंदगी में क्या शोहरत की शोहबत ने कर दिया है क़त्ल हमारी संवेदनाओं का या झूठी कामयाबी के खुमार में गुम हो गया असल मकसद जिंदगी का? क्या यूँ ही जारी रहेगा सवालों का सिलसिला? या मिलेगा कभी जवाब इनका?
किसके लिए संजोते हो सपना , दुनिया की इस भीड़ में नहीं होता हैं कोई अपना. देंगे दगा वही जिसे दिल में बसाते हो, करेंगे रुसवा वही जिनके लिए खुशियाँ जुटाते हो. तुम पर नहीं, तुम्हारी शोहरत पर झुकते हैं लोग. जो गिरोगे एक बार, तो रौंद कर निकल जायेंगे आगे . भावना, प्यार, सम्मान का नहीं हैं यहाँ कोई मोल. बस पैसो में तौले जाते हैं यहाँ रिश्तों के डोर.

रटे रटाए जुमले

गुनहगारों को बख्शा नहीं जाएगा, हम पड़ोसी मुल्क को चेतावनी देते हैं, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी ये कुछ ऐसे रटे रटाए शब्द हैं जो तकरीब़न हर राजनेता की ज़ुबान पर रहता है। लेकिन कोई ज़रा उनसे पूछे कि मात्र जनता के बीच स्टेज पर जाकर ऐसे ऐलान और चेतावनी देनें से क्या होने वाला है? अगर इनकी चेतावनियों में ज़रा भी दम होता अगर वाक़ई ये हालात के प्रति गंभीर होते तो दिनों दिन अपराधियों की हिम्मत बढ़ी नहीं होती। कोई नेता किसी दलित का बलात्कार करने की हिमाकत न करता, दिन दहाड़े तेज़ाब फेंकने, छेड़छाड़ और रेप के मामले नहीं बढ़ते। पड़ोसी मुल्क हमारी धरती पर आतंक का तांडव रचकर हमें ही ललकारने का दुस्साहस न करतें. इतना सब होते हुए भी हमारे नेताओं को रटे रटाए बरसो पुराने जुमले पढ़ने में शर्म नहीं आती। कोरे वादे करके उन्हें लगता है कि उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई. अगर ऐसा ही चलता रहा तो हालात और भयावह हो जाएंगे.

जिंदगी

हर पल हर घड़ी एक सवाल हैं जिंदगी, कुछ अनसुलझे सवालो से परेशां हैं जिंदगी , इसकी अपनी नहीं हैं कोई बिसात, बस वक़्त की गुलाम है जिंदगी।
ना कोई आचार है ना कोई विचार है जाने कैसा ये संसार है ना सत्‍य की पहचान, ना है असत्‍य का ज्ञान इन्‍हे ते बस चलानी है खबरों की दुकान चौथे स्‍तंभ का मिला है जिसे दर्जा आज खोखली हो गई उसकी ही बुनियाद है

इंतहा

इंतहा हो गई इम्तिहान की, कदर नहीं इस जहां में इसांन की काम करने वालों की नहीं, हुकूमत चलती है यहां कामचोरों की मर चुका है जमीर जिनका, वो क्या जाने अहमियत स्वाभिमान की मुफ्त में मिल गया है नाम जिनको, वो क्या जाने कीमत मेहनत की झूठी शान के है जो दिवाने, वो क्या जाने हकीकत जिंदगी की हर सीमा को लाघ चुके हैं जो, वो क्या जाने हदे इंसानियत की हद होती है हर बात है कि, मगर इंतहा नहीं इनकी चापलूसी भरी बात की

सवालों की लहर

जिंदगी के समंदर में उठती है सवालों की लहर जब मन में हलचल मच जाती है तब देखकर हर तरफ झूठ का अंधेरा अशांत हो जाता है मन और फिर उठ जाती है सवालों की एक लहर.... आखिर कब खत्म होगा फरेब का खेल और जीवन में आएगी सच की रोशनी क्या कभी होगी जीत इंसानियत की विश्वास, सम्मान, सत्य, सहयोग की अहमियत लोग समझेंगे कब? फिर खड़ी हो गई सवालों की एक नई लहर, लेकिन हर बार की तरह लौट गई मन के किनारों से टकराकर