गुनहगारों को बख्शा नहीं जाएगा, हम पड़ोसी मुल्क को चेतावनी देते हैं, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी
ये कुछ ऐसे रटे रटाए शब्द हैं जो तकरीब़न हर राजनेता की ज़ुबान पर रहता है। लेकिन कोई ज़रा उनसे पूछे कि
मात्र जनता के बीच स्टेज पर जाकर ऐसे ऐलान और चेतावनी देनें से क्या होने वाला है? अगर इनकी चेतावनियों में
ज़रा भी दम होता अगर वाक़ई ये हालात के प्रति गंभीर होते तो दिनों दिन अपराधियों की हिम्मत बढ़ी नहीं होती।
कोई नेता किसी दलित का बलात्कार करने की हिमाकत न करता, दिन दहाड़े तेज़ाब फेंकने, छेड़छाड़ और रेप के
मामले नहीं बढ़ते। पड़ोसी मुल्क हमारी धरती पर आतंक का तांडव रचकर हमें ही ललकारने का दुस्साहस न करतें.
इतना सब होते हुए भी हमारे नेताओं को रटे रटाए बरसो पुराने जुमले पढ़ने में शर्म नहीं आती। कोरे वादे करके उन्हें
लगता है कि उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई. अगर ऐसा ही चलता रहा तो हालात और भयावह हो जाएंगे.
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