Wednesday, September 9, 2015

साड़ी पहनना सभ्‍यता है और शॉर्ट स्‍कर्ट..?



आज सुबह रोज़ाना की तरह लोकल ट्रेन में दो महिलाओं की आपसी बातचीत हो रही थी,  तभी शॉर्ट ड्रेस पहने एक सुंदर सी लड़की उनके सामने आ गई।  उसे देखते ही दोनों अधेड़ उम्र महिलाएं उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगी।
दरअसल, वो उसकी छोटी स्कर्ट के नीचे से झांकती ख़ूबसूरत टांगों को देखकर चिढ़ भी रही थी, कि हाय! कितनी सुंदर है और बदन दिखाने के लिए आपस में मिलकर उसे कोस भी रही थी - आजकल की लड़कियों को कपड़े पहनने का ढंग ही नहीं है, पता नहीं शरीर ढंकने के लिए कपड़े पहनती हैं या दिखाने के लिए? अब ऐसे कपड़े पहनकर सड़क पर निकलेंगी तो लड़के छेड़खानी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे? काफ़ी देर तक ये दोनों मोहतरमा इसी तरह उस लड़की के पहनावे का पोस्टमार्टम करती रहीं। दिलचस्प बात तो ये रही कि उस लड़की को बदन दिखाने के लिए कोसने वाली दोनों महिलाओं कहने को तो साड़ी पहनी थी, मगर डीप नेक ब्लाउज़ और बेतरतीब ढंग से पहनी साड़ी में उनका बदन भी ढंका कम ही था, मगर चूंकि उन्होंने साड़ी पहनी है, इसलिए वो सभ्य हैं।
इन महिलाओं की बातें सुनकर मुझे हैरानी नहीं हुई, क्योंकि अक्सर इस तरह की बातें हर जगह सुनने को मिल ही जाती है। जब कभी कहीं महिलाओं के साथ बर्बरता की कोई ख़बर सुर्ख़ियों में आती है, तो बिना कुछ जाने-समझे-सोचे फट से लोग (जिसमें आम से लेकर ख़ास सब शामिल रहते हैं) कह देते हैं इतने छोटे कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत थी, अब ऐसे तंग कपड़ों में घूमेगी तो ऐसा तो होना ही था। कमाल कि बात है एक तरफ़ तो हम मॉर्डनिटी और खुले विचारों की बात करते हैं यानी हर किसी को अपनी पसंद से जीने, खाने-पीने, पहनने का हक़ है और दूसरी तरफ़ कभी कॉलेज में लड़कियों के लिए ड्रेस कोड लागू किया जाता है, तो कभी उनके जींस पहनने पर पाबंदी लगाई जाती है। ये कैसी मॉडर्निटी है?
जब लड़के शॉर्ट्स और बनियान में घूमते हैं या कई बार बनियान उतार भी देते हैं तो क्या कभी किसी ने ये सुना कि लड़कियों ने उनके साथ छेड़छाड़ की? या उन्हें अश्‍लील कहा गया? शायद... शायद क्यों, निश्‍चय ही नहीं..!  ऐसा उनके लिए कभी नहीं कहा जाता, क्योंकि हमारे समाज ने शालीनता के सारे नियम स़िर्फ और स़िर्फ महिलाओं के लिए ही बनाए गए हैं। पुरुष तो इस नियम की परिधि से पहले भी बाहर थे और अब भी।
इस मामले में एक और बात जो हैरान करती है कि लड़कियों के पहनावे पर कमेंट करने वाले कई अधेड़ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी ख़ुद की बेटियां भी आधुनिक लिबास ही पहनती हैं, मगर दूसरी लड़कियों/महिलाओं को शालीनता का पाठ पढ़ाने वाले ऐसे लोग वो नियम अपने घर की बेटियों पर लागू नहीं करतें यानी हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। मैं ये नहीं कहती कि आज़ादी के नाम पर लड़कियां कपड़े उतारकर घूमें, मगर वो क्या पहनेंगी और क्या नहीं ये उन्हें ही डिसाइड करने दीजिए। जिस तरह महिलाएं पुरुषों के पहनावे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करतीं, उसी तरह पुरुषों को भी इससे दूर ही रहना चाहिए। जहां तक उनके साथ छेड़खानी का सवाल है, तो ये कपड़ों की वजह से नहीं, बल्कि गंदी मानसिकता का नतीजा है। यदि स़िर्फ मॉर्डन कपड़े ही ज़िम्मेदार होते तो कोई साड़ी/सलवार-कमीज़ पहनी महिला से बदतमीज़ी नहीं करता, छोटी-छोटी मासूम बच्चियों को अपनी हैवानियत का शिकार नहीं बनाता।
हाल ही में मुबई की लोकर ट्रेन में किसी मनचले एक लड़की से रेप की कोशिश की, उसके कपड़े फाड़ डाले। हालांकि लड़की के शोर मचाने पर वो वहां से भाग खड़ा हुआ। अगर गौर करें तो इस तरह की जितनी भी वारदातें होती हैं उसके पीछे कपड़े नहीं, बल्कि बीमार और विकृत मानसिकता होती है। लड़कियों को लिबास बदलने की सलाह देने वालों क्यों नहीं इस पुरुषवादी समाज को अपने विचार बदलने की सलाह देते हैं?

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