तुम और मैं नहीं, हम से घोले रिश्ते में प्यार की चाश्नी..!
कभी बस स्टॉप, तो कभी समुद्र किनारे, कभी किसी बागीचे में फूलों के बीच एक गुलाब लिए जिसका इंतज़ार किया करते थे, आज वही गुलाब के कांटों की तरह क्यों चुभने लगा है?, जिसकी आंखों की शरारत और मधुर मुस्कान मर मिटने का मन होता था, आज उसकी हर बात में कड़वाहट क्यों नज़र आती है?
कैसे बदल गए वो, कैसे बदल गई मैं?
अक्सर फुर्सत के पलों में संजना अतीत की उन मधुर स्मृतियों में खो जाती, जिन्हें याद करके आज भी उसकी हिरणी जैसी आंखें शर्म से झुक जाती, मगर दूसरे ही क्षण वर्तमान का एहसास उसे दुखी कर देता। कभी अपने प्यार के लिए पूरे परिवार से दुश्मनी मोल लेने वाली संजना और नीरज ने 3 साल पहले लव मैरिज की थी। दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि वो कभी टिपिकल पति-पत्नी नहीं, बल्कि दोस्त की तरह रहेंगे, हर काम मिल बांटकर करेंगे।
कुछ दिन तो सब ठीक रहा, मगर मर्द तो आख़िर मर्द ही होता है, वो भी हमारे भारतीय पुरुष, जिन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि बेटा घर के काम तेरे जिम्मे नहीं है, तुझे तो बस पढ़-लिखकर कमाना है (आजकल की आधुनिक माएं इसकी अपवाद ज़रूर हैं, मगर उनकी संख्या गिनती में ही है।) अब जिस मर्द को बचपन से ही ये सीख जन्मघुट्टी की तरह पिलाई जाए, भला उसका असर इतनी जल्दी कैसे ख़त्म हो सकता है?
धीरे-धीरे उनके रिश्ते में भी अहं आ ही गया। पति को लगने लगा कि हमेशा वो क्यों संजना के काम में हाथ बंटाए? घर का काम तो औरतों की ही ज़िम्मेदारी है, ऐसे में अगर संजना ऑफिस से आने के बाद किचन की ज़िम्मेदारी उठाती है, तो इसमें ग़लत क्या है? पति में आए इस बदलाव को संजना भी पचा नहीं पा रही थी, वो भी वर्किंग है, पति जितना ही कमाती है, व़क्त आने पर उसकी आर्थिक मदद भी करती है, तो यदि घर की ज़िम्मेदारी उठाने में उसने पति का सहयोग मांगा तो इसमें क्या बुरा है? बस फिर क्या था, अक्सर दोनों के बीच कहासुनी हो जाती, ‘ये तुम्हारा काम है मैं क्यूं करूं? तुम अपना काम ख़ुद किया करो। ये मेरा नहीं तुम्हारा है। ऐसे ही दोनों एक-दूसरे पर शब्दों के बाण चलाते रहते। अपने बीच आई इस दरार से दोनों ही आहत थे, मगर दोनों का अहं उन्हें झुकने नहीं दे रहा था।
दरअसल, पुरुषों को ये समझना होगा कि औरतें भी इंसान होती हैं, उनके पास भी दो ही हाथ-पैर हैं, तो एक साथ ही वो परफेक्ट पत्नी और परफेक्ट वर्किंग वुमन के खाके में फिट नहीं बैठ सकती। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। यदि आपको स्मार्ट और कामकाजी पत्नी चाहिए, तो ख़ुद आपको पुरुषों के परंपरावादी चोले से बाहर निकलकर हालात को समझना होगा। गृहस्थी की गाड़ी बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ाने के लिए तुम ये काम कर लो कि बजाय, चलो हम ये काम कर लेते हैं, वाला रुख अख़्तियार करना होगा।
ऑफिस में बॉस ने डांट दिया या किसी कलिग से बहस हो जाने पर कैसे घर आने पर आपका मूड बिल्कुल ख़राब रहता है और कुछ काम करने का मन नहीं होता, वैसा ही पत्नी के साथ भी तो होता होगा? उस पर आपकी फरमाइशों की लंबी फेहरिस्त सुनकर क्या उसका ग़ुस्सा होना लाज़मी नहीं है? आपके उदास होने पर वो पूछती है, क्या आज ऑफिस में कुछ हुआ है क्या? मगर उसके उतरे चेहरे और बुझी-बुझी आंखों की तरफ़ देखे बिना आप ऑर्डर कर देते हैं, मुझे तो आज बिरयानी ही खाना है? ये भी नहीं सोचते कि उसकी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या ये बेहतर नहीं होता कि दोनों में से जो जल्दी घर आ जाएं, वो किचन का मोर्चा संभाल ले या फिर बाकी के काम कर ले?
जब दोस्तों के बीच मेरी पत्नी तो फलां कंपनी में मैनेजेर है कहकर आप अपनी कॉलर टाइट करते हैं, तो आपका सिर गर्व से ऊंचा करने वाली पत्नी के काम में हाथ बंटाना क्या आपका फर्ज़ नहीं है?
मोहमम्द रफी का गाया फिल्म नया दौर का ये गाना साथी हाथ बढ़ाना... को यदि कभी-कभार आत्मसात कर लें, तो शायद उनके रिश्तों में तुम और मैं की कड़वाहट की जगह हम की चाशनी घुल जाएगी।
No comments:
Post a Comment