Monday, September 21, 2015

..तो इस चीज का नशा था ‘इंद्राणी’ को..?

कुछ साल पहले एक चौदह वर्षीया लड़की (आरुषि) की निर्मम हत्या का मामला सामने आने के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी। हर किसी की ज़ुबां पर इस हत्याकांड के चर्चे थे, वो इसलिए नहीं था कि ये हमारे देश का कोई पहला हत्याकांड हो, बल्कि इसलिए था क्योंकि इसमें हत्या का दोषी कोई और नहीं, बल्कि लड़की के अपने माता-पिता थे। अब वे वाक़ई दोषी हैं या नहीं ये, तो आज भी राज बना ही हुआ है हालांकि हैं फिलहाल दोनों जेल में। इस हत्याकांड के सामने आते ही सबसे विश्‍वसनीय माना जाने वाला बच्चे और मां-बाप का रिश्ता ही सवालों में घिर गया। क्या कोई माता-पिता अपनी ही औलाद को यूं मार सकते हैं?

अब कई सालों बाद एक बार फिर यही बहस शुरू हो गई है। ताज़ा मामला है शीना बोरा हत्याकांड का है, जिसकी गुत्थी मकड़ी के जाले से कम उलझी हुई नहीं है। इस केस ने तो सारे रिश्तों चाहे वो पति-पत्नी का हो या मां-बेटी का सबकी विश्‍वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यकीनन मां जो बच्चे की सरंक्षक होती है, अगर वही उसकी दुश्मन बन जाए, तो भला वो इस दुनिया का सामना कैसे करेगा? हमारी संस्कृति में मां को हमेशा सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया है, मगर इंद्राणी जैसी मां ने संसार के सबसे पवित्र और ख़ूबसूरत रिश्ते को कलंकित कर दिया है। ज़रा सोचिए ऐसी ख़बरों का बच्चों के मन पर क्या असर होता होगा?
किसी भी महिला का महत्वाकांक्षी होना और तरक्क़ी करना बिल्कुल भी ग़लत नहीं है, मगर ये किस क़ीमत पर? क्या किसी औरत की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ सकती है कि वो अपनी ही औलाद जिसे नौ महीने अपने ख़ून से सींचा हो, को इस बेरहमी से दुनिया से विदा कर दे और उस पर भी ख़ुद को बेगुनाह साबित करने के लिए नई-नई पैतरे बाज़ी करे। चेहरे पर बेटी को खोने का कोई ग़म, दुख नहीं।
मानना पड़ेगा इंद्राणी को। गजब के आत्मविश्‍वास और मज़बूत इरादों वाली महिला है वो। अगर अपनी इस ख़ूबी को इंद्राणी ने सही दिशा में इस्तेमाल किया होता, तो शायद वो लोगों की रोल मॉडल बन सकती थी, मगर दौलत और शोहरत की अपनी भूख मिटाने के लिए उसने जिस तरह से रिश्तों का खेल खेला है, हर रिश्ते में विश्‍वास को तार-तार किया है, लोगों का तो ख़ून के रिश्तों पर से ही विश्‍वास उठ जाएगा।
बड़े-बड़े महलनुमा घरों व लग्ज़री कारों में चलने वाली उच्‍च तबके की महिलाओं को देखकर लगता है कि शायद इनके जीवन में कोई कमी नहीं है, ये बहुत सुखी होंगी, क्योंकि इनके पास ढेर सारे पैसे हैं, तो ये कुछ भी ख़रीद सकती हैं। मगर हक़ीकत तो ये है कि जो जितना अमीर है उतना ही डरा हुआ रहता है, उसे दौलत-शोहरत छिन जाने का डर सताता रहता है। इन्हें प्यार, अपनापन, रिश्ते-नाते मिडिल क्लास मेंटैलिटी की बात लगती है। ये अपने बच्चों को महंगे-महंगे खिलौने तो दे देंगी, मगर अपना समय और प्यार नहीं दे सकतीं, क्योंकि इन्हें किसी क्लाइंट के साथ मीटिंग में जाना होता है या फिर कोई पार्टी इनका इंतज़ार कर रही होती है।
हर चीज़ को पैसों के तराज़ू में तौलने वाले ऐसे लोगों की ज़िंदगी सब कुछ होते हुए भी पूर्ण नहीं होती, क्योंकि और, और, और ज़्यादा पाने की इनकी भूख इन्हें संतुष्ट नहीं होने देती। और ज़्यादा की अपनी चाह को पूरा करने के चक्कर में इनके पास जो चीज़ हैं वो उसका भी लुत्फ़ नहीं उठा पाते। सारी सुख-सुविधाएं होते हुए भी सुकून से सहज ज़िंदगी नहीं जी पाते। रिश्तों और इंसानियत से दूर होते ऐसे लोग जल्दी ही किसी मशीन में तब्दील हो जाते हैं, जिनका मकसद स़िर्फ और स़िर्फ बैंक बैलेंस बढ़ाना होता है।

अब जब इंसान का दिल ही मशीनी हो जाए, तो उससे भला आप किसी तरह की भावनाओं और संवेदनाओं की अपेक्षा कर सकते हैं। आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा, बी प्रैक्टिकल, डोन्ट बी इमोशनल फूल, जिन लोगों के लिए भावनाएं बेवकूफ़ी होती हों उनसे प्यार और अपनेपन की उम्मीद करना बेमानी ही होगी। शायद ये प्रैक्टिकल होने का ही नतीजा है कि रिश्तों से संवेदनाएं दूर होती जा रही हैं।
निश्चित ही रिश्ते तो हैं, मगर उनमें जुड़ाव और गहराई नहीं है। वो थोथे चने की तरह खोखले हो चुके हैं।  पति-पत्नी, मां-बाप व बच्चे, भाई-बहन हर वो रिश्ता जो पहले विश्‍वास और सुरक्षा की गारंटी होता था, उसकी बुनियाद खोखली होती जा रही है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए बहुत ख़तरनाक है. अब इंद्राणी मुखर्जी दोषी हैं या नहीं ये फैसला तो अदालत करेगी, मगर अब तक उससे जुड़ी जितनी जानकारी सामने आई है, उससे वो रिश्तों की बड़ी सौदागर से कम नहीं लगतीं।

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