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Showing posts from January, 2011

जिंदगी

हर पल हर घड़ी एक सवाल हैं जिंदगी, कुछ अनसुलझे सवालो से परेशां हैं जिंदगी , इसकी अपनी नहीं हैं कोई बिसात, बस वक़्त की गुलाम है जिंदगी।
ना कोई आचार है ना कोई विचार है जाने कैसा ये संसार है ना सत्‍य की पहचान, ना है असत्‍य का ज्ञान इन्‍हे ते बस चलानी है खबरों की दुकान चौथे स्‍तंभ का मिला है जिसे दर्जा आज खोखली हो गई उसकी ही बुनियाद है

इंतहा

इंतहा हो गई इम्तिहान की, कदर नहीं इस जहां में इसांन की काम करने वालों की नहीं, हुकूमत चलती है यहां कामचोरों की मर चुका है जमीर जिनका, वो क्या जाने अहमियत स्वाभिमान की मुफ्त में मिल गया है नाम जिनको, वो क्या जाने कीमत मेहनत की झूठी शान के है जो दिवाने, वो क्या जाने हकीकत जिंदगी की हर सीमा को लाघ चुके हैं जो, वो क्या जाने हदे इंसानियत की हद होती है हर बात है कि, मगर इंतहा नहीं इनकी चापलूसी भरी बात की

सवालों की लहर

जिंदगी के समंदर में उठती है सवालों की लहर जब मन में हलचल मच जाती है तब देखकर हर तरफ झूठ का अंधेरा अशांत हो जाता है मन और फिर उठ जाती है सवालों की एक लहर.... आखिर कब खत्म होगा फरेब का खेल और जीवन में आएगी सच की रोशनी क्या कभी होगी जीत इंसानियत की विश्वास, सम्मान, सत्य, सहयोग की अहमियत लोग समझेंगे कब? फिर खड़ी हो गई सवालों की एक नई लहर, लेकिन हर बार की तरह लौट गई मन के किनारों से टकराकर