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Showing posts from July, 2010

खबरों का झूठा संसार

दिन ब दिन न्यूज चैनलों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है ये बात और है कि इस भीड़ में शामिल होने वाले नए चैनलों की सांसे ज्यादा लंबे समय तक चल नहीं पाती, और इससे पहले की लोग नए नवेले चैनल से वाकिफ हो ये दम तोड़ देते हैं... जिस रफ्तार से इनकी तादाद बढ़ रही है उतनी ही तेजी से वो अर्श से फर्श पर भी आ रहे हैं... ताश के पत्तों की तरह इनका अस्तित्व चंद महीनों में ही ढह जाता है... दरअल, वर्तमान में न्यूज चैनल चलाना किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह ही हो गया है, ताज्जुब की बात तो ये है कि आजकल वो लोग भी चैनल खोल लेते हैं जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं होता... तभी तो ऐसे चैनल पर खबरों के नाम पर दिखाए जाते है फूहड़ मनोरंजन कार्यक्रम... अब अगर किसी एक चैनल ने कोई नया ट्रेंड शुरू किया तो सभी उसी का अनुसरण करने लगते हैं चाहे वो नए हों या पुराने... नए खुलने वाले चैनल तो खासतौर से नकल पर ही अपनी खबरों की दुकान चलाते हैं... आपको जानकर हैरानी होगी कि कई चैनल में काम करने वाले लोग तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी चीजों से भी अवगत नहीं होते... फिर भी उंचे ओहदे पर बैठे होते हैं... ऐसा लगता है मानों खबरों की अंध...

दो पल की हस्ती

दो पल की है हस्ती कल मिट्टी में मिल जाना है जब तक है सांसे दुनिया की हर रीत निभाना है मरने पर याद करे जमाना, कुछ ऐसा कर जाना है नहीं रहेगी हस्ती मेरी तो क्या लोगों के दिल में बस जाना है दो पल की है हस्ती कल मिट्टी में मिल जाना है जीवन है जब तक अपनों से प्रीत निभाना है दिल में हो सौ दर्द मगर फिर भी मुस्कुराना है खुद जलकर मुझको दुनिया को रौशन कर जाना है

ज़िंदगी एक तलाश

ये ज़िंदगी एक तलाश है किसी को नौकरी तो किसी को प्यार की आस है खुशी की तलाश में हर कोई उदास है यकीन रखों ख़ुद पे एक दिन पूरी होगी ज़िंदगी की तलाश और हर ख़ुशी होगी तुम्हारे पास

दायरा

हम भी उड़ सकते हैं आसमान में एक मौका तो दो छू सकते हैं गगन की ऊचाइयों को पख फैलाने के लिए दायरा तो दो
हम भी उड़ सकते हैं आसमान मेंएक मौका तो दोछू सकते हैं गगन की ऊंचाईयों कोपंख फैलाने के लिए दायरा तो दो

खोखली बुनियाद

एक बार फिर वही नज़रा दिखा चारो तरफ़ उदासी का साया दिखा हर किसी की जुबां ख़ामोश थी मगर आंखों मे ढेरो सवाल दिखें अब डर लगता है ख़ामोशी से हमें तो भीड़ में भी तन्हाई दिखी बनाया था जिस इमारत को हमने बड़े नाज़ों से आज उसकी ही बुनियाद क्यों खोखली दिखी?

विचित्र है इंसान

विचित्र है ये दुनिया, विचित्र है इंसान अब इनकी क्या सुनाए हम आपको दास्तान करते थे जिसकी बुराईयां कभी, आज कर रहे हैं उनका ही गुणगान समझ से परे होते हैं ऐसे इंसान न होती है शर्म इनमें ना होता है इनका कोई इमान खुद की अकल का पता नहीं और दूसरों को देते फिरते हैं ये ज्ञान दिल में नफरत समेटे हुए जाने कैसे बिखेरते रहते हैं ये मुस्कान देखकर इनको शायद सोचता होगा भगवान आखिर कैसे हो गई भूल मुझसे इंसान की शक्ल में मैंने भेज दिया शैतान

कैसी है उलझन?

जाने क्यों उदास है मन, पाया है कुछ मैने लेकिन खुशी नहीं उसकी गम है बहुत कुछ खोने का रिश्ता पुराना तो नहीं पर गहरा बहुत है वो मेरे अपने तो नहीं पर अपनों से कम भी नहीं हैं जो चाहा नहीं था वो कर रही हूं जो चाहा वो कर नहीं पाई वक्त ले रहा है इम्तिहान हमारा खड़े हैं हम दोराहे पर रास्ता चुन तो लिया है फिर भी मन में है जाने कैसी उलझन

वक्त

वक्त भी क्या करवट बदलता है आज उन गलियारों में खोमोशी का डेरा है जहां कभी होता था खुशी का बसेरा भीड़ की जगह एकांत है, मन सवालों से अशांत है हर तरफ अनिश्चितताओं को है अंधेरा फिर भी मन में बस एक धुंधली सी उम्मीद है कि वक्त शायद फिर ले कोई और करवट