कामकाजी माएं और बचपन से तरसता ममत्व..!
3 सालों का लंबा सफ़र जैसे पलक झपकते ही बीत गया। लगता है कल ही की तो बात थी, जब मैं अपनी नन्हीं सी बेटी को गोद में उठाए उसकी मासूम मुस्कान पर मोहित होती रहती थी। उसके कोमल स्पर्श से मन पुलकित हो जाता था। उसी मासूम बच्ची को आज पहली बार स्कूल भेजते समय महसूस हुआ जैसे मैंने उसका बचपन ठीक से देखा भी नहीं और जिया भी नहीं। कब मेरी गुड़िया इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। स़िर्फ 3 महीने की ही थी, वो जब मैंने दुबारा नौकरी ज्वॉइन कर ली, एक तरफ़ कॅरियर बनाने की महत्वाकांक्षा और दूसरी तरफ़ मां की ममता, बड़ी कश्मकश के बाद दिल को समझाया कि यूं ममता की रौ में बहने से काम नहीं चलेगा, बेटी को अच्छी परवरिश देनी है, तो आर्थिक रूप से मज़बूत बनना भी ज़रूरी है। मेरी बेटी अपनी दादी के हाथों स्नेह-दुलार में ज़रूर पलती रही, मगर मैं उसके नन्हें क़दमों की पहली आहट, उसका वो लड़खाड़कर चलना... सब मिस करती रही अब सोचती हूं तो याद ही नहीं आता है कि उसने पहली बार मां कब कहा था, उसने पहला शब्द क्या कहा था, वो पहली बार चली कब थी? जब कभी दूसरी मांओं के मुंह से ये सुनती मेरे बेटे/बेटी ने पहला शब्द फलां कहा, वो इतने महीने में चलने लगी...! तब एहसास होता है कि मैंने कितने अनमोल पल खो दिए। इस मशीनी दुनिया में लगता है कामकाजी माएं भी मशीन ही हो जाती हैं, जो हर काम समय पर करती हैं, मर्ज़ी न सही मजबूरी में ही।
सुबह उठकर घर के काम निपटाकर बच्चे को ब्रश करवाकर जल्दी-जल्दी नाश्ता करवाना, उसके ज़िद्द करने, आनाकानी करने पर बार-बार ये दुहाई देने बेटा ममा को ऑफिस के लिए देर हो जाएगी, जल्दी से खा लो मेरा राजा बेटा, शाम को ममा आपके लिए चॉकलेट/खिलौने लाएगी। अपनी ममता को चॉकलेट और खिलौने के तराज़ू में तौलना मां की मजबूरी है और इसके एवज में उसे ताने भी सुनने पड़ते है कि तुम बच्चे को बिगाड़ रही हो, आख़िर अपने लाड़ले/लाड़ली को समय न दे पाने की टीस वो कैसे दूर करे? उसके पास इतना व़क्त भी नहीं रहता कि अपने जिगर के टुकड़े को दुलार ले, उसके नखरे उठा लें। कैसे करे वो ये सब? ऑफिस का कंप्यूटर और फाइलें जो उसकी राह तक रहा होता है।
आखिर क्या करें किसे दोष दें? नौकरी करने का फैसला भी तो उसका अपना ही है, आत्मनिर्भर बनने का सपना, मगर इन सबके बीच वर्किंग वुमन एक मां के दिल को कैसे संभालती हैं, किसी को क्या पता, अपने मासूम बच्चे को छोड़कर जाते व़क्त उसके दिल में उठने वाले भावनाओं के बवंडर को बस दूसरी मां ही समझ सकती है। हम घर और ऑफिस के बीच संतुलन की चाहे जितनी बातें कर ली जाएं, मगर ये एक कड़वा सच है कि कामकाजी माएं अपने बच्चों का बचपना नहीं देख पाती, उनकी मासूम शरारतों को बस एलबम में ही देखकर दिल को दिलासा दे लेती हैं. बच्चों को मां का प्यार और दुलार मिलता है, मगर किश्तों में।
स्कूल से आने के बाद उन्हें अपनी मां के हाथ का खाना नसीब नहीं होता, हां फोन करके मां हालचाल ज़रूर पूछ लेती है। शाम को मां उसके साथ खेल नहीं सकती, उसे रोज़ घूमाने नहीं ले जा सकती, यहां तक की उसके स्कूल के किस्से सुनने के लिए भी मां के पास व़क्त नहीं रहता. कभी-कभी अपनी इस बेबसी पर मां का दिल भी रोता है, कई बार मैंने भी महसूस किया अपनी मासूम बेटी की आंखों में मेरे लिए शिकायत, मगर चाहकर भी उसे दूर नहीं कर सकती।
अपनी तोतली भाषा में जब वो कहती है... तू आज ऑफिस नहीं जा रही न, तो दिल तो सचमुच करता न जाऊं, दिनभर उसे अपनी गोद में छुपाए रखूं, उसके साथ मस्ती करूं... पर ऐसा करना संभव नहीं हो पाता। वर्किंग होने का ख़ामियाज़ा मां की ममता से समझौते के रूप में भुगतना पड़ता है। आज सुबह ऑफिस के लिए निकलते व़क्त बेटी ने फिर पूछा ममा आप मुझे स्कूल से लेने आओगे ने? उसके इस मासूम सवाल का मुस्कुराकर जवाब देकर, उसके माथे को चूमकर मैं बस घर से निकल गई और मां के मन में फिर कश्मकश चलने लगी।
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