सिंदूर, बिंदी और मंगलसूत्र का मोहताज नहीं है पत्नी का रिश्ता..!
मांग में सिंदूर भरे माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाए, पायल छमकाती मिसेज खन्ना अपनी पड़ोसन से शिकायत करने पहुंची थी। अपनी नई नवेली देवरानी की। दरअसल, मिसेज़ ख़न्ना उन महिलाओं में से हैं जिनके लिए रिश्ते निभाने का मतलब है उससे जुड़ी हर मान्यता, रीति-रिवाज़ और निशानियों को तहे दिल से मानना।
हालांकि ऐसा नहीं है कि वो शिक्षित नहीं हैं। मिसेज़ ख़न्ना ग्रैज्युएट हैं, मगर पत्नी धर्म के मामले में उनकी राय किसी भी 70-80 साल की बुज़ुर्ग महिला से अलग नहीं है, जिनके लिए पति परमेश्वर हैं और उस परमेश्वर का नाम लेना भी गुनाह है। उन्हें तो बस ऐजी, ओजी, सुनिए जी या फलां के पापा जैसे संबोधनों से ही बुलाया जा सकता है। अन्यथा भगवान नाराज़ हो जाएंगे। ये बातें आज की मॉर्डन महिलाओं को बहुत बचकानी लग सकती हैं, मगर ये सच हैं।
हां, तो बात हो रही थी मिसेज़ खन्ना की, जो अपनी नई-नई देवरानी के चाल-चलन से दुखी थीं। हुआ यूं कि उनकी देवरानी प्रिया एमबीए थी और मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत थी, शादी के बाद भी बाक़ायदा उसने नौकरी जारी रखी। चूंकि वो मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हैं तो ज़ाहिर है कि उसका ड्रेस कोड भी उसी के मुताबिक़ होगा, बस यही बात मिसेज़ खन्ना को खल गई। कल की आई देवरानी उनके सामने
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कोर्ट-पैंट, ट्राउज़र-शर्ट पहने, बिना कानों में झुमके, बिना पायल-बिछुए, बिंदी और मंगलसूत्र पहने रोज़ाना इसी तरह बिंदास ऑफिस जाने लगी, तो उनके दिल पर सांप लोटने लगे। कैसी बदतमीज़ लड़की है, इसे तो अपने संस्कारों का ज़रा भी ख़्याल नहीं। शादी हुए महीना भर नहीं बीता की मैडम ने सारे सुहाग चिन्ह उतार दिए। इसे अपने पति की ज़रा भी परवाह नहीं। इस तरह सुहाग चिन्ह उतारने से कहीं पति पर कोई संकट आ गया तो, उस परकटी को तो इसकी भी चिंता नहीं है।
हद तो ये है कि अपने पति को भी नाम से बुलाती है। एक बार मैंने उसे समझाने कि कोशिश की कि हमारे धर्म में पति को नाम से नहीं बुलाते हैं, इससे उनकी उम्र कम हो जाती है, तो ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए बोली, ‘भाभी आप भी किस ज़माने की बात करती हैं, ये सब झूठी बाते हैं। हाय राम! मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि अब हमारे घर का क्या होगा? अपनी ऐसी ही कई चिंताएं मिसेज़ खन्ना अपनी पड़ोसन से शेयर करती रहीं। वो पड़ोसन को बताती हैं कि कई दफ़ा उन्होंने प्रिया (देवरानी) को इन सबके लिए टोका भी, मगर उसने हमेशा बड़ी ही शांति से उन्हें समझाने की कोशिश की कि उसके लिए ये सारी निशानियां पहनना संभव नहीं है और उसे नहीं लगता कि स़िर्फ चूड़ी, बिंदी और बिछुए पहनने से ही वो सुहागिन या पत्नी का धर्म निभाएगी।
प्रिया की तरह ही बहुत-सी महिलाएं है जिन्हें पतिव्रता कहलाने के लिए निशानियों में बंधना ज़रूरी नहीं लगता, मगर इनकी चाची, मौसी और पड़ोस की काकी को इससे बड़ी आपत्ति है। कलयुग है भई! आजकल की लड़कियां सुहाग चिन्ह भी नहीं लगाती, पति की कोई इज्ज़त भी नहीं करती हैं। अब भला इन काकी/चाची/मौसियों को कौन समझाएं कि आप तो पति के पैर दबाकर स़िर्फ कुछ देर के लिए उनकी शारिरिक थकान कम कर देती थीं, मगर ये तो पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं, उनका आर्थिक व मानसिक बोझ साझा करती हैं। एक दोस्त की तरह उन्हें समझाती है, उनसे सलाह लेती और देती हैं। वे बात-बात पर पति से साड़ी और गहनों की फरमाइश नहीं करती, बल्कि नया घर-गाड़ी ख़रीदने से लेकर घर चलाने और ईएमआई भरने में उनकी मदद करती हैं।
वैसे भी क्या हमारे देश में शादीशुदा पुरुषों के लिए क्या कोई निशानी अनिवार्य है? क्या वो कोई ऐसी चीज़ पहनते या लगाते हैं, जिससे उनके शादीशुदा होने का पता चले? नहीं है न, तो बंधन स़िर्फ महिलाओं के लिए ही क्यों? यदि किसी को इन सारी चीज़ों में ख़ुशी मिलती है तो वो इसे अपनाएं, लेकिन कोई महिला यदि इन निशानियों से दूर रहना चाहे, तो उसे भी इसकी आज़ादी होनी चाहिए। सुहाग चिन्हों के आधार पर उसके पत्नी धर्म को आंकना सही नहीं होगा। कई बार तो पति ख़ुद नहीं चाहते कि उनकी पत्नी टिपिकल महिलाओं की तरह मांग भर सिंदूर और पूरे हाथ में चूड़ियां पहने उनके साथ ठुमकती चले। वैसे भी पति-पत्नी का रिश्ता प्यार, विश्वास, आपसी समझ और समझदारी का होता है उसमें भला निशानियों का क्या काम?
‘नहीं दरकार मुझे झुमके, पायल, बिछुए, बिंदी, सिंदूर और मंगलसूत्र की, बस काफ़ी है मेरा प्यार उनके दिल में जगह बनाने के लिए।’
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