सवालों का सिलसिला

भावहीन हो गयी है कविता, सारहीन गया है साहित्य
उद्देश्यहीन हो गयी पत्रकारिता और अर्थहीन हो गया है जीवन
क्या ये असर है विकास की अंधी दौर का?
या नतीजा है दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ने की होड़ का?
जज़्बात, प्यार, भावनाएं, विचार सिमट गये हैं बस शब्दों में
खलती है अब इनकी कमी जिंदगी में
क्या शोहरत की शोहबत ने कर दिया है क़त्ल हमारी संवेदनाओं का
या झूठी कामयाबी के खुमार में गुम हो गया असल मकसद जिंदगी का?
क्या यूँ ही जारी रहेगा सवालों का सिलसिला?
या मिलेगा कभी जवाब इनका?

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