मॉर्डन बहू बनाम तहजीब की चटनी ऊर्फ नकचढ़ी रेसिपी
सिन्हा साहब बड़े ख़ुश थे। हों भी क्यों न, आख़िर बहुत ढूंढने पर उन्हें अपने कमांडर बेटे के लिए ख़ूबसूरत, पढ़ी-लिखी और बेटे के बराबर ओहदे वाली बहू जो मिल गई। स्मार्ट, शिक्षित, सुंदर। जब इतनी ख़ूबियों वाली बहू मिल जाए, तो किसी का भी ख़ुश होना लाज़मी ही है। सिन्हा साहब दोस्त-बिरादरी से लेकर रिश्तेदारों तक अपनी इस मॉर्डन बहू की तारी़फे करते नहीं थकते थे, मगर उन बेचारों को क्या पता था कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। चेहरे की सुंदरता और स्मार्टनेस का मतलब ये नहीं होता कि इंसान अंदर से भी ख़ूबसूरत होगा। शादी के चंद दिनों बाद ही मिस्टर सिन्हा की सारी ख़ुशियां काफूर हो गई, क्योंकि उनकी बहू मॉर्डन ज़रूर थी, मगर संस्कारों से उसका कोई सरोकार नहीं था।
इकलौती बहू होने के कारण सिन्हा दंपती अपनी बहू से बहुत उम्मीदें लगाए बैठे थे। सबसे कहते फिरते की उनकी बेटी की कमी बहू ने पूरी कर दी। मगर उन्हें क्या पता था कि उनकी मॉर्डन बहू बेटी की कमी पूरी करना तो दूर उनसे उनका बेटा भी छीन लेगी। ऊंची हील और छोटी स्कर्ट वाली इस बहू को स़िर्फ और स़िर्फ अपने पति से मतलब था। छुट्टी के दिन 12 बजे उसकी मॉर्निंग होती, फिर इस अलसाई बहू को फ्रेश होने में शाम हो जाती। किचन और कुकिंग। ये शब्द तो उसकी डिक्शनरी में थे ही नहीं और न ही कभी सासू मां से ये पूछने की ज़हमत उठाती कि आज आप क्या बना रही हैं, या क्या कुछ मदद करूं? बेचारे सास-ससुर अपनी लाड़ली बहू के प्यार भरे दो बोल सुनने के लिए तरसते रहते। दोनों बुज़ुर्ग मन ही मन घुटते रहते, मगर अपनी ये घुटन बेटे से भी साझा नहीं कर पाते, क्योंकि बेटा भी तो बदल गया था। पत्नी को समझाने की बजाय मां-बाप को ही समझाने लगता कि अब ज़माना बदल गया है, अब पहले की तरह घूंघट और सास-ससुर के पैर दबाने वाली बहू नहीं मिलेगी। बेटे की समझाइश पर दोनो बेचारे सोच में पड़ जाते कि आख़िर कब उन्होंने बहू से ऐसी उम्मीद की? उन्हें न तो बहू के कपड़ों से कभी कोई परेशानी हुई, न घंटो मोबाइल/लैपटॉप पर चिपके रहने से। न तो उन्होंने इस संबंध में कभी कुछ कहा ही, उन्हें तो बस ये बात सालती कि जिसे बेटी समझा उसको हमारे घर में रहने से ही दिक्क़त है या यूं कहे कि हमारी हैसियत घर में पड़े किसी पुराने समान से ज़्यादा नहीं, जिसे कोई पूछता ही नहीं है, जिसकी मौजूदगी के कोई मायने ही नहीं है। वैसे आज के दौर में सिन्हा दंपती अकेले नहीं हैं, उनके जैसे पैरेंट्स की कहानी आज के महानगरों, शहरों और कस्बों की कहानी है। फिर अब तो बहू मायके से विदा ही इस शर्त पर होती है कि, उसका अपना फ्लैट है या नहीं, या फिर घर में उसके लिए सैपरेट कोई जगह भी है कि नहीं।
बहरहाल, सवाल ये उठता है कि क्या मॉर्डनिटी का मतलब है अपने संस्कार भूल जाना, बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान न करना, तमीज़ और तहज़ीब से नाता तोड़ लेना, छोटे कपड़ों के साथ ही अपनी सोच का दायरा भी छोटा कर लेना? पैसों के आगे रिश्तों को बौना समझने लगना? क्या मां की ममता और पिता के स्नेह/दुलार की कोई क़ीमत नहीं होती? आपके पास डिग्री होने का ये मतलब तो नहीं कि आप माता-पिता से बड़े हो गए। मानाकि आप लाख रुपए कमाती हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने फैसले ख़ुद लेती हैं, निश्चित ही ये सब बहुत अच्छी बाते हैं, मगर अपनी इस क़ामयाबी में अगर आप अपनों को भी शामिल कर लेतीं तो ज़रा सोचिए कितना अच्छा रहता। बहू अपने सास-सुसर से कभी सीधे मुंह बात तक नहीं करती, मगर पार्टीज़ और सोशल गैदरिंग में ख़ुद को बहुत सामाजिक दिखाती है। अपनी किसी दोस्त की मां से हंस-हंसकर गले मिलती है, मगर घर में बैठी बेचारी सांस से कभी उनका हाल तक नहीं पूछती। पति के दोस्तों के आने पर चहलक़दमी बढ़ जाती है, मगर ससुर जब एक कप चाय मांगे तो बड़ी बेपरवाही से अनसुना कर देती है, कभी सोचा है आपके इस बर्ताव से उनकी भावनाएं कितनी आहत होती होंगी? यदि आपके माता-पिता के साथ भी उनकी बहू ऐसा ही बर्ताव करे, तो कैसा महसूस होगा? निश्चित ही बहुत बुरा लगेगा। शायद आपको ग़ुस्सा भी आए। फिर ये क्यों नहीं सोचती कि जिस पति के साथ आज आप ऐशो आराम की ज़िंदगी जी रही हैं उसे इस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए उसके माता-पिता ने अपनी रातों की नींद और दिन का चैन लुटाया है। उस बेटे को हर सुख-सुविधा देने के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं की बली चढ़ाई है।
जरा सोचिए तो सही, आपका पति किसी का बेटा भी तो है। किसी नए रिश्ते में जुड़ने का ये मतलब तो नहीं कि पुराने से नाता तोड़ लिया जाए। उच्च शिक्षा, समृद्धि और संपन्नता क्या इंसान को इतना छोटा बना देती है कि उसे अपनों का साथ ही बोझ लगने लगता है? फिर तो कम पढ़े-लिखे और गरीब लोग ही बेहतर हैं, जो कम-से-कम रिश्तों की अहमियत तो समझते हैं। यदि आप सचमुच मॉर्डन बनना चाहती हैं, तो किसी रिश्ते को तोड़कर नहीं, बल्कि उसे सहेजकर आगे बढ़िए। अपनी परंपरा, संस्कृति और संस्कारों के साथ मॉर्डनिटी का सामंजस्य स्थापित करने पर ही आप वास्तविक मॉर्डन बहू बन पाएंगी।
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