Monday, September 21, 2015

क्‍या प्‍यार अंतरंग पलों में ही सिमट गया है?



‘तुम्हारे पास पूरे परिवार के लिए व़क्त रहता है बस मेरे लिए ही नहीं रहता, अब तुम मुझसे प्यार नहीं करती। कितनी बदल गई हो तुम!  तुम्हें पति की कोई परवाह ही नहीं है, तुम्हारी प्राइऑरटी लिस्ट में मेरा नंबर शायद सबसे आखिर में है’।  शादी के बाद, खासकर बच्चे के जन्म के बाद एक पति को अपनी पत्नी से अक्सर ऐसी ही शिकायत रहती है। मेरे पति को भी हैं, बगैर कुछ सोचे-समझे पति महोदय की उलाहनाओं की लिस्ट लंबी होती जाती है और मैं बेचारगी की स्थिति में कई बार ये सोचने पर विवश हो जाती हूं कि क्या सचमुच मैंने कोई गलती कर दी है?  मगर मैं करूं भी तो क्या? वक्त ने जिम्मेदारियों का इतना लबादा ओढ़ा दिया है कि कभी आइने के सामने घंटों संवरने वाली लड़की, अब खुद को ठीक से आईने में निहार भी नहीं पाती। जब मेरे पास खुद अपने लिए ही वक्त नहीं है, तो कैसे मैं नवविवाहिता/प्रेयसी की तरह तुम्हारे गले में बांहों का हार डाले बैठी रहूं?
शादी के पहले तुम्हारे हाथों में हाथ डाले जब घंटों मैं बेफिक्र घूमती थी, तब मैं एक मां की दुलारी बेटी थी, हर जिम्मेदारी, चिंता-फिक्र से कोसों दूर। मगर अब बहू, पत्नी, मां, भाभी जैसे ढेरों रिश्तों में बंधी एक संपूर्ण स्त्री हूं, जिसके लिए अपनी इच्छा सबसे आखिर में आती है। परिस्थितियां बदली हैं, मैं नहीं, मगर तुम्हें कौन समझाए? ऑफिस से घर तक के सफर में अब मैं तुमसे मिलने के रूमानी ख़्याल से रोमांचित नहीं होती, क्‍योंकि तब मुझे ये चिंता सताती है कि अरे! आज डिनर में क्या बनेगा, बेटे का होमवर्क कब करवाऊंगी, कल ऑफिस में प्रेजेंटेशन देनी है उसकी प्रैक्टिस नहीं की तो मेरा प्रमोशन रुक जाएगा। सासू मां को डॉक्टर के पास ले जाना है। लॉन्ड्री में कपड़े देने हैं और ऐसे ही ना जाने कितने काम जिसे गिनाने बैठूं तो शायद पन्ना यूं ही भर जाए। अब मैं बिंदास बेटी नहीं, बल्कि रिश्तों के बंधन में बंधी बहू हूं। मगर आप तो कल जैसे बेफिक्र बेटे थे आज वैसे ही बेफिक्र पति। आपकी जिंदगी में तो कुछ नहीं बदला। वही परिवार, वही घर, वही दिनचर्या, मगर मेरी तो पूरी दुनिया ही बदल गई, तुम क्यों नहीं समझते हालात के इस बदलाव को?

मेरे ऊपर उंगली उठाने से पहले जरा अपने जेहन में झांककर देखो, कितने वादे किए थे तुमने मुझसे। हम दोस्त की तरह रहेंगे, हर काम मिलकर करेंगे, क्या हुआ उन वादों का? बच्चे की जिम्मेदारी मेरी, किचन भी मेरे हिस्से, आपके कपड़े-जूते सहेजना भी मेरे जिम्मे, आपके माता-पिता की देखभाल भी मेरे जिम्मे फिर कैसी बराबरी, कैसी साझेदारी?
तुम मायके मत जाओ आज मेरी दीदी/बुआ आ रही हैं। अपने दोस्तों से मिलने आज मत जाना आज मेरे ऑफिस की पार्टी में चलना है। हर वक्त समझौता भी मैं ही करूं?  मगर आपने कब मेरे बारे में सोचा? कब ये सोचा कि पत्नी भी तो नौकरी करती है, फिर घर आकर इतना काम, बच्चे की जिम्मेदारी भी उठाती है, वो भी तो थक जाती होगी, क्यों न आज उसकी थोड़ी मदद ही कर दूं ताकि उसे भी थोड़ा आराम मिल जाए। एक प्रेमिका से किए वादे पत्नी बनते ही बिसरा दिए आपने और फिर शिकायत करते हो कि तुम बदल गई!
हर जिम्मेदारी निभाने के बाद थकान से चूर-चूर हो चुके शरीर ने अगर रूमानी होने से इनकार कर दिया, तो क्या ये गुनाह है? जब ऑफिस के तनाव के कारण मुझसे बात किए बगैर तुम मुंह फेरकर सो जाते हो, तो क्या मैंने शिकायत की? क्या प्यार के मायने बस उन अंतरंग पलों तक ही सीमित होते हैं? खुद का अस्तित्व भुलाकर तुम्हारे परिवार में पूरी तरह से रम जाना, सबकी देखभाल में खुद को भूल जाना, सबको खिलाकर आखिर में खाना, तुम्हारी हर जीत पर खुश होना और हार पर मायूस होना...इसे क्या कहते हैं?

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