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रटे रटाए जुमले

गुनहगारों को बख्शा नहीं जाएगा, हम पड़ोसी मुल्क को चेतावनी देते हैं, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी ये कुछ ऐसे रटे रटाए शब्द हैं जो तकरीब़न हर राजनेता की ज़ुबान पर रहता है। लेकिन कोई ज़रा उनसे पूछे कि मात्र जनता के बीच स्टेज पर जाकर ऐसे ऐलान और चेतावनी देनें से क्या होने वाला है? अगर इनकी चेतावनियों में ज़रा भी दम होता अगर वाक़ई ये हालात के प्रति गंभीर होते तो दिनों दिन अपराधियों की हिम्मत बढ़ी नहीं होती। कोई नेता किसी दलित का बलात्कार करने की हिमाकत न करता, दिन दहाड़े तेज़ाब फेंकने, छेड़छाड़ और रेप के मामले नहीं बढ़ते। पड़ोसी मुल्क हमारी धरती पर आतंक का तांडव रचकर हमें ही ललकारने का दुस्साहस न करतें. इतना सब होते हुए भी हमारे नेताओं को रटे रटाए बरसो पुराने जुमले पढ़ने में शर्म नहीं आती। कोरे वादे करके उन्हें लगता है कि उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई. अगर ऐसा ही चलता रहा तो हालात और भयावह हो जाएंगे.

जिंदगी

हर पल हर घड़ी एक सवाल हैं जिंदगी, कुछ अनसुलझे सवालो से परेशां हैं जिंदगी , इसकी अपनी नहीं हैं कोई बिसात, बस वक़्त की गुलाम है जिंदगी।
ना कोई आचार है ना कोई विचार है जाने कैसा ये संसार है ना सत्‍य की पहचान, ना है असत्‍य का ज्ञान इन्‍हे ते बस चलानी है खबरों की दुकान चौथे स्‍तंभ का मिला है जिसे दर्जा आज खोखली हो गई उसकी ही बुनियाद है

इंतहा

इंतहा हो गई इम्तिहान की, कदर नहीं इस जहां में इसांन की काम करने वालों की नहीं, हुकूमत चलती है यहां कामचोरों की मर चुका है जमीर जिनका, वो क्या जाने अहमियत स्वाभिमान की मुफ्त में मिल गया है नाम जिनको, वो क्या जाने कीमत मेहनत की झूठी शान के है जो दिवाने, वो क्या जाने हकीकत जिंदगी की हर सीमा को लाघ चुके हैं जो, वो क्या जाने हदे इंसानियत की हद होती है हर बात है कि, मगर इंतहा नहीं इनकी चापलूसी भरी बात की

सवालों की लहर

जिंदगी के समंदर में उठती है सवालों की लहर जब मन में हलचल मच जाती है तब देखकर हर तरफ झूठ का अंधेरा अशांत हो जाता है मन और फिर उठ जाती है सवालों की एक लहर.... आखिर कब खत्म होगा फरेब का खेल और जीवन में आएगी सच की रोशनी क्या कभी होगी जीत इंसानियत की विश्वास, सम्मान, सत्य, सहयोग की अहमियत लोग समझेंगे कब? फिर खड़ी हो गई सवालों की एक नई लहर, लेकिन हर बार की तरह लौट गई मन के किनारों से टकराकर

खामोशी

अब तो चुप्पी तोड़ो, ख़ामोश क्यों हो? कुछ तो बोलो, लुट रहा है देश खुलेआम, बिना रिश्वत के नहीं होता यहां कोई काम, भ्रष्टाचारियों ने डुबो दी है देश की शान, ठगा सा महसूस कर रहा है आम इंसान, हाय! किस पर करूं मैं विश्वास. दो वक़्त की रोटी मुश्किल हो गई है गरीबों की और तिजोरी भरती जा रही अमीरों की. घोटालों की घुटन में कहीं घुट न जाए देश, इसलिए अब तो मन को टटोलो जी अब तो कुछ बोलो मनमोहन जी.
उम्मीदों का आसमां बहुत बड़ा है, हकीकत का धरातल है छोटा रिश्तों की गहराई बहुत है, मगर साथ है छोटा.