Monday, September 21, 2015

मां को भी चाहिए मी टाइम


‘अच्छी लगती है तेरी मासूम शरारतें, लड़खड़ाते क़दमों से चलकर मेरी ओर, अपनी तोतली भाषा में मुझे मां कहना, सुकून मिलता है तुझे सीने से लगाकर, तेरी हंसी से आती है मेरी चेहरे पर मुस्कान, तेरी ख़ुशी के लिए मंज़ूर है हर ़कुर्बानी मुझे. बस चाहती हूं चंद लम्हें ख़ुद को तलाशने, अपने वजूद को बनाए रखने के लिए ताकि तुझे भी फ़ख्र हो अपनी मां पर.’
हर मां के दिल में शायद यही जज़्बात होते हैं, त्याग और ममता की मूर्ति का लबादा पहनाकर हमेशा ही औरत/मां को ये एहसास दिलाया गया है कि उसके लिए परिवार और उसका बच्चा ही सब कुछ है. ये बात सच है कि हर मां के लिए उसका बच्चा सबसे पहले होता है बाकी सब कुछ बाद में, मगर इसके साथ ये बात भी सौ फीसदी सही है कि मां, पत्नी होने के साथ ही औरत का अपना भी अलग, अस्तित्व/पहचान होती है. उसकी भी कुछ इच्छाएं होती है, जो परिवार और बच्चों से अलग होती है. कुछ समय उसे अपने लिए भी चाहिए जब वो किसी की पत्नी, मां नहीं स़िर्फ मैं हो.
आज की भाषा में जिसे मी टाइम कहा जाता है, उसकी ज़रूरत हर मां को होती हैं. हर दिन एक ही तरह के रूटीन से जब बाकी इंसान बोर हो जाते हैं तो क्या मां नहीं होती? ये बात समाज और परिवार को समझनी चाहिए. साथ ही महिलाओं को ख़ुद भी पहल करनी चाहिए. लड़ाई-झगड़े से नहीं, बल्कि प्यार से अपने हमसफ़र और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ तालमेल बिठाकर वो कुछ समय अपने लिए निकाल सकती है, जिसमें वो अपने शौक़ पूरे करके ख़ुद को तरोताज़ा कर सकती है. ज़रा याद करिए पूरे साल ऑफिस के काम के बाद जब आप कुछ दिनों की छुट्टी मनाकर वापस आते हैं, तो कितना फ्रेश फील करते हैं और दोबारा नई ऊर्जा के साथ काम शुरू करते हैं. इसी तरह यदि मां को अपने लिए मी टाइम मिल जाए तो वो अपनी ज़िम्मेदारी और बेहतर तरी़के से निभा पाएगी.
अक्सर महिलाएं अपने बच्चों से दूर होने पर गिल्टी फील करने लगती हैं, उन्हें लगता है कि वो बच्चे के साथ नाइंसाफ़ी कर रही है, जबकि ऐसा नहीं है. महीने में एकाध दिन यदि कुछ घंटे आप बच्चे को छोड़कर स़िर्फ अपनी ज़िंदगी जी रही हैं, तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, अपनी ज़िंदगी पर आपका ख़ुद का भी तो कई हक़ है. तो ख़ुश रहने के लिए सबसे पहले अपनी गिल्ट फीलिंग से बाहर आइए और उस पल का आनंद लीजिए. क्या पार्टी में जाने या दोस्तों संग होटल में मस्ती करते समय आपके पति को गिल्ट फील होता है कि उन्होंने बच्चे को समय नहीं दिया? नहीं ना... फिर आप क्यों ऐसा सोचती है, परिवार और बच्चा आपकी ज़िम्मेदारी है इस बात में कोई दो राय नहीं है, मगर ख़ुद को ख़ुश रखने की ज़िम्मेदारी भी तो आप पर ही है.
कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी हो जाती है कि मी टाइम की बात स़िर्फ वर्किंग मदर के लिए होती है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है. घर पर रहने वाली मां के लिए ये ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि गैस पर चाय की केतली चढ़ाने से शुरू हुआ उनका दिन रात को डिनर में पति और बच्चों के लिए क्या बनाऊं की टेंशन में ही बीत जाता है. ऐसे में दोपहर का कुछ समय अपने लिए निकालकर अपना कोई पसंदीदा काम करें या दोस्त/क़रीबी रिश्तेदार जिनेस आपका संबंध अच्छे हों, को कुछ देर के लिए बच्चों की ज़िम्मेदारी सौंपकर कहीं बाहर घूम आएं/शॉपिंग कर लें, वरना बच्चों और पति के प्यार का बंधन बहुत जल्दी बोझ लगने लगेगा. अपने लिए कुछ न कर पाने पर उपजी कुंठा व तनाव अंदर ही अंदर आपको तोड़ देता है, जिसका असर तुंरत आपके व्यवहार पर नज़र आने लगता है. बात-बात पर चिढ़ना, बच्चे को मारना ये सब आपकी फ्रस्ट्रेशन दिखाता है. इस फ्रस्ट्रेशन का असर आपके निजी और सामाजिक दोनों जीवन पर पड़ता है यानी आपकी ख़ुशी और संतुष्टि से सारी चीज़ें जुड़ी हुई है. अतः अपनी ख़ुशी का ख़्याल रखें. जिस तरह ज़्यादा काम लेने के बाद मशीन को कुछ देर बंद कर दिया जाता ताकि दोबारा वो पूरी स्पीड में काम करें, उसी तरह अगर आप भी पूरी क्षमता और ख़ुशी से अपनी मां होने की ज़िम्मेदारी निभाना चाहती हैं, तो कुछ समय ख़ुद के लिए भी निकाले, थोड़ी-सी स्मार्टनेस दिखाकर और चीज़ों को मैनेज करके आप ये काम आसानी से कर सकती हैं.

शादी के लिए लुक कितना मायने रखता है?


लड़की कैसी लगी बेटा? मां बहुत अच्छी... अक्सर शादी के लिए लड़की देखने गए बेटे से मां का पहला सवाल यही होता है कि लड़की कैसी थी, मगर इस सवाल में कैसी का संबंध उसके बाहरी रूप, चेहरे से होता है और जवाब में अच्छी का ताल्लुक़ भी बस सुंदरता से ही होता है. कुछ अपवाद होना अलग बात है.
हद तो ये है कि आज के पढ़-लिखे और ख़ुद को मॉर्डन कहने वाले ऐसे युवा जो ये कहते हैं कि उनके लिए स़िर्फ बाहरी सुंदरता मायने नहीं रखती, अपनी शादी की बात आते ही पलट जाते हैं. मैंने ख़ुद ऐसे कई लोगों को देखा है जिन्होंने उच्च शिक्षित और अच्छे पोस्ट पर काम करने वाली लड़की को स़िर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि वो उनके अच्छी वाले पैमाने पर फिट नहीं बैठ रही थी. कभी सांवला रंग, कभी लंबाई तो कभी मोटी कमर... ये सारी चीज़ें शिक्षा पर भारी पड़ जाती हैं. मेरे पड़ोस में रहने वाले एक जनाब वैसे तो डॉक्टर हैं, मगर उनके विचार किसी देहाती से बिल्कुल कम नहीं है, जब शादी की बात आई, तो जनाब ने कई पढ़ी-लिखी लड़कियों के रिश्ते रिजेक्ट कर दिए क्योंकि वो सुंदर नहीं दिखती थी, और हमेशा करियर ओरिएंटेड पत्नी की तलाश में रहने वाले डॉक्टर साहब ने एक दसवीं पास लड़की से शादी के लिए हामी भर दी. क्यों? क्योंकि उसका गोरा बदन और हसीन चेहरा डॉक्टर साहब के दिल में उतर गया... लोगों का इलाज करने वाले जॉक्टर साहब उसकी कातिल अदाओं से घायल हो गए. इसमें भला उनका क्या कसूर, ख़ूबसूरती पर फिदा होना तो मर्दों की फितरत होती है. ख़ैर, ये बात और है कि जनाब डॉक्टर की शादी ज़्यादा दिन टिकी नहीं. बीवी की सुंदरता का ख़ुमार उन पर से से जल्दी ही उतरने लगा, जब कहीं पत्नी के साथ बाहर/पार्टी में जाते, तो उसका अनप्रोफेशनल व्यवहार उन्हें शर्मिंदा कर देता. जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि स़िर्फ सुंदरता के सहारे ज़िंदगी नहीं बीतती. हमारे आसपास ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, मगर बावजूद इसके सुंदरता को लेकर हमारी मानसिकता नहीं बदलती. आपको एक वाक़या बताऊं, हमारे पड़ोसी मिस्टर शर्मा 4 साल से बेटे की शादी के लिए परेशान थे, जी हां, सही पढ़ा आपने बेटे, वरना आजतक तो स़िर्फ लड़कियों की शादी के लिए ही परेशान हुआ जाता था, मगर अब हालात बदल रहे हैं. शर्मा जी के बेटे के लिए पचासों रिश्ते आएं, एक से एक पढ़ी-लिखी लड़कियां, मगर बेटे को किसी की नाक टेढ़ी लगती, तो किसी का क़द छोटा. कोई मोटी लगती, तो किसी का मुंह टेढ़ा... ऐसी ही और न जाने कितनी उपाधियां दे डाली उसने लड़कियों को क्योंकि जनाब की निगाहें तो कुछ और ढूंढ रही थी. साहबज़ादे के लिए शिक्षित से ज़्यादा ज़रूरी थी, सुंदर पत्नी... दरअसल, हमारी फितरत ही ऐसी है कि हम दूसरों को लाख समझा लें कि दिखावे पर मत जाओ... पर जब ख़ुद की बारी आती है, तो हम वही करते हैं, जो करने से दूसरों को मना करते आए हैं. बाहरी रंग-रूप और सुंदरता, शादी करने के लिए लड़कियों में ये योग्यता पहले से बहुत मायने रखती हैं, मगर बदलते समय के साथ हमें ये ग़लतफहमी होने लगी कि जब लड़कियां भी लड़कों से हर मामले में बराबरी पर हैं, तो शायद ये पुराना पैमाना टूट जाए, मगर हम ग़लत थे. ऐसा कुछ नहीं हुआ...
वैसा शर्मा जी के बेटे को अपने लिए एक बेहद सुंदर मगर कम पढ़ी-लिखी पत्नी मिल ही गई. पत्नी की सुंदरता पर मुग्ध शर्मा जी के बेटे शादी के बाद कुछ हफ्तों तक तो अपने कमरे से ही नहीं निकलें, मगर कुछ ही महीनों बाद स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई. अब वो अपने कमरे के अंदर कम ही दिखाई देते हैं. पत्नी सुंदर न हो, मगर समझदार हो तो पति की आंखों में सुदरता ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाती है, लेकिन पत्नी बहुत सुंदर है, मगर समझदारी से दूर-दराज़ तक उसका कोई रिश्ता नहीं है, तो पति की आंखों में बसी उसकी सुंदर छवि ख़राब होते देर नहीं लगती. वैस मुझे पता है कि कोई कितना भी ज्ञान बखार ले, लोग करेंगे वही जो उनका मन कहेगा, किसी की समझाइश ख़ासकर मुफ़्त की समझाइश बेअसर ही रहती है.
जहां तक शादी के रिश्ते के सवाल है, तो इस रिश्ते को निभाने के लिए पत्नी का सुंदर होना नहीं बल्कि समझदार/शिक्षित होना ज़्यादा मायने रखता है. जो इस सच को समझ जाते हैं, उनकी गृहस्थी की गाड़ी तो राजधानी की स्पीड में बिना रोक-टोक के चलती रहती है और जो नहीं समझते उनके रिश्ते की हालत मलागाड़ी या पैसेंजर ट्रेन जैसी हो जाती है. तो अगर आप भी कहीं लड़की देखने जा रहे हैं, तो दिखावे पर जाने की बजाय अपनी अक्ल लगाइएगा.





मॉर्डन बहू बनाम तहजीब की चटनी ऊर्फ नकचढ़ी रेसिपी



सिन्हा साहब बड़े ख़ुश थे। हों भी क्यों न, आख़िर बहुत ढूंढने पर उन्हें अपने कमांडर बेटे के लिए ख़ूबसूरत, पढ़ी-लिखी और बेटे के बराबर ओहदे वाली बहू जो मिल गई। स्मार्ट, शिक्षित, सुंदर। जब इतनी ख़ूबियों वाली बहू मिल जाए, तो किसी का भी ख़ुश होना लाज़मी ही है। सिन्हा साहब दोस्त-बिरादरी से लेकर रिश्तेदारों तक अपनी इस मॉर्डन बहू की तारी़फे करते नहीं थकते थे, मगर उन बेचारों को क्‍या पता था कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। चेहरे की सुंदरता और स्मार्टनेस का मतलब ये नहीं होता कि इंसान अंदर से भी ख़ूबसूरत होगा। शादी के चंद दिनों बाद ही मिस्टर सिन्हा की सारी ख़ुशियां काफूर हो गई, क्योंकि उनकी बहू मॉर्डन ज़रूर थी, मगर संस्कारों से उसका कोई सरोकार नहीं था।
इकलौती बहू होने के कारण सिन्हा दंपती अपनी बहू से बहुत उम्मीदें लगाए बैठे थे। सबसे कहते फिरते की उनकी बेटी की कमी बहू ने पूरी कर दी। मगर उन्हें क्या पता था कि उनकी मॉर्डन बहू बेटी की कमी पूरी करना तो दूर उनसे उनका बेटा भी छीन लेगी। ऊंची हील और छोटी स्कर्ट वाली इस बहू को स़िर्फ और स़िर्फ अपने पति से मतलब था। छुट्टी के दिन 12 बजे उसकी मॉर्निंग होती, फिर इस अलसाई बहू को फ्रेश होने में शाम हो जाती। किचन और कुकिंग। ये शब्द तो उसकी डिक्शनरी में थे ही नहीं और न ही कभी सासू मां से ये पूछने की ज़हमत उठाती कि आज आप क्या बना रही हैं, या क्या कुछ मदद करूं? बेचारे सास-ससुर अपनी लाड़ली बहू के प्यार भरे दो बोल सुनने के लिए तरसते रहते। दोनों बुज़ुर्ग मन ही मन घुटते रहते, मगर अपनी ये घुटन बेटे से भी साझा नहीं कर पाते, क्योंकि बेटा भी तो बदल गया था। पत्नी को समझाने की बजाय मां-बाप को ही समझाने लगता कि अब ज़माना बदल गया है, अब पहले की तरह घूंघट और सास-ससुर के पैर दबाने वाली बहू नहीं मिलेगी। बेटे की समझाइश पर दोनो बेचारे सोच में पड़ जाते कि आख़िर कब उन्होंने बहू से ऐसी उम्मीद की? उन्हें न तो बहू के कपड़ों से कभी कोई परेशानी हुई, न घंटो मोबाइल/लैपटॉप पर चिपके रहने से। न तो उन्होंने इस संबंध में कभी कुछ कहा ही, उन्हें तो बस ये बात सालती कि जिसे बेटी समझा उसको हमारे घर में रहने से ही दिक्क़त है या यूं कहे कि हमारी हैसियत घर में पड़े किसी पुराने समान से ज़्यादा नहीं, जिसे कोई पूछता ही नहीं है, जिसकी मौजूदगी के कोई मायने ही नहीं है। वैसे आज के दौर में सिन्हा दंपती अकेले नहीं हैं, उनके जैसे पैरेंट्स की कहानी आज के महानगरों, शहरों और कस्‍बों की कहानी है। फिर अब तो बहू मायके से विदा ही इस शर्त पर होती है कि, उसका अपना फ्लैट है या नहीं, या फिर घर में उसके लिए सैपरेट कोई जगह भी है कि नहीं।
बहरहाल, सवाल ये उठता है कि क्या मॉर्डनिटी का मतलब है अपने संस्कार भूल जाना, बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान न करना, तमीज़ और तहज़ीब से नाता तोड़ लेना, छोटे कपड़ों के साथ ही अपनी सोच का दायरा भी छोटा कर लेना? पैसों के आगे रिश्तों को बौना समझने लगना? क्या मां की ममता और पिता के स्नेह/दुलार की कोई क़ीमत नहीं होती? आपके पास डिग्री होने का ये मतलब तो नहीं कि आप माता-पिता से बड़े हो गए। मानाकि आप लाख रुपए कमाती हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने फैसले ख़ुद लेती हैं, निश्चित ही ये सब बहुत अच्छी बाते हैं, मगर अपनी इस क़ामयाबी में अगर आप अपनों को भी शामिल कर लेतीं तो ज़रा सोचिए कितना अच्छा रहता। बहू अपने सास-सुसर से कभी सीधे मुंह बात तक नहीं करती, मगर पार्टीज़ और सोशल गैदरिंग में ख़ुद को बहुत सामाजिक दिखाती है। अपनी किसी दोस्त की मां से हंस-हंसकर गले मिलती है, मगर घर में बैठी बेचारी सांस से कभी उनका हाल तक नहीं पूछती। पति के दोस्तों के आने पर चहलक़दमी बढ़ जाती है, मगर ससुर जब एक कप चाय मांगे तो बड़ी बेपरवाही से अनसुना कर देती है, कभी सोचा है आपके इस बर्ताव से उनकी भावनाएं कितनी आहत होती होंगी? यदि आपके माता-पिता के साथ भी उनकी बहू ऐसा ही बर्ताव करे, तो कैसा महसूस होगा? निश्चित ही बहुत बुरा लगेगा। शायद आपको ग़ुस्सा भी आए। फिर ये क्यों नहीं सोचती कि जिस पति के साथ आज आप ऐशो आराम की ज़िंदगी जी रही हैं उसे इस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए उसके माता-पिता ने अपनी रातों की नींद और दिन का चैन लुटाया है। उस बेटे को हर सुख-सुविधा देने के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं की बली चढ़ाई है।
जरा सोचिए तो सही, आपका पति किसी का बेटा भी तो है।  किसी नए रिश्ते में जुड़ने का ये मतलब तो नहीं कि पुराने से नाता तोड़ लिया जाए। उच्च शिक्षा, समृद्धि और संपन्नता क्या इंसान को इतना छोटा बना देती है कि उसे अपनों का साथ ही बोझ लगने लगता है? फिर तो कम पढ़े-लिखे और गरीब लोग ही बेहतर हैं, जो कम-से-कम रिश्तों की अहमियत तो समझते हैं। यदि आप सचमुच मॉर्डन बनना चाहती हैं, तो किसी रिश्ते को तोड़कर नहीं, बल्कि उसे सहेजकर आगे बढ़िए। अपनी परंपरा, संस्कृति और संस्कारों के साथ मॉर्डनिटी का सामंजस्य स्थापित करने पर ही आप वास्तविक मॉर्डन बहू बन पाएंगी।

कामकाजी माएं और बचपन से तरसता ममत्‍व..!


3 सालों का लंबा सफ़र जैसे पलक झपकते ही बीत गया।  लगता है कल ही की तो बात थी, जब मैं अपनी नन्हीं सी बेटी को गोद में उठाए उसकी मासूम मुस्कान पर मोहित होती रहती थी। उसके कोमल स्पर्श से मन पुल‍कित हो जाता था। उसी मासूम बच्ची को आज पहली बार स्कूल भेजते समय महसूस हुआ जैसे मैंने उसका बचपन ठीक से देखा भी नहीं और जिया भी नहीं।  कब मेरी गुड़िया इतनी बड़ी हो गई पता ही नहीं चला।  स़िर्फ 3 महीने की ही थी, वो जब मैंने दुबारा नौकरी ज्वॉइन कर ली, एक तरफ़ कॅरियर बनाने की महत्वाकांक्षा और दूसरी तरफ़ मां की ममता, बड़ी कश्मकश के बाद दिल को समझाया कि यूं ममता की रौ में बहने से काम नहीं चलेगा, बेटी को अच्छी परवरिश देनी है, तो आर्थिक रूप से मज़बूत बनना भी ज़रूरी है। मेरी बेटी अपनी दादी के हाथों स्नेह-दुलार में ज़रूर पलती रही, मगर मैं उसके नन्हें क़दमों की पहली आहट, उसका वो लड़खाड़कर चलना... सब मिस करती रही अब सोचती हूं तो याद ही नहीं आता है कि उसने पहली बार मां कब कहा था, उसने पहला शब्द क्या कहा था, वो पहली बार चली कब थी? जब कभी दूसरी मांओं के मुंह से ये सुनती मेरे बेटे/बेटी ने पहला शब्द फलां कहा, वो इतने महीने में चलने लगी...! तब एहसास होता है कि मैंने कितने अनमोल पल खो दिए।  इस मशीनी दुनिया में लगता है कामकाजी माएं भी मशीन ही हो जाती हैं, जो हर काम समय पर करती हैं, मर्ज़ी न सही मजबूरी में ही।
सुबह उठकर घर के काम निपटाकर बच्चे को ब्रश करवाकर जल्दी-जल्दी नाश्ता करवाना, उसके ज़िद्द करने, आनाकानी करने पर बार-बार ये दुहाई देने बेटा ममा को ऑफिस के लिए देर हो जाएगी, जल्दी से खा लो मेरा राजा बेटा, शाम को ममा आपके लिए चॉकलेट/खिलौने लाएगी। अपनी ममता को चॉकलेट और खिलौने के तराज़ू में तौलना मां की मजबूरी है और इसके एवज में उसे ताने भी सुनने पड़ते है कि तुम बच्चे को बिगाड़ रही हो, आख़िर अपने लाड़ले/लाड़ली को समय न दे पाने की टीस वो कैसे दूर करे? उसके पास इतना व़क्त भी नहीं रहता कि अपने जिगर के टुकड़े को दुलार ले, उसके नखरे उठा लें।  कैसे करे वो ये सब? ऑफिस का कंप्यूटर और फाइलें जो उसकी राह तक रहा होता है।
आखिर क्या करें किसे दोष दें? नौकरी करने का फैसला भी तो उसका अपना ही है, आत्मनिर्भर बनने का सपना, मगर इन सबके बीच वर्किंग वुमन एक मां के दिल को कैसे संभालती हैं, किसी को क्या पता,  अपने मासूम बच्चे को छोड़कर जाते व़क्त उसके दिल में उठने वाले भावनाओं के बवंडर को बस दूसरी मां ही समझ सकती है। हम घर और ऑफिस के बीच संतुलन की चाहे जितनी बातें कर ली जाएं, मगर ये एक कड़वा सच है कि कामकाजी माएं अपने बच्चों का बचपना नहीं देख पाती, उनकी मासूम शरारतों को बस एलबम में ही देखकर दिल को दिलासा दे लेती हैं. बच्चों को मां का प्यार और दुलार मिलता है, मगर किश्तों में।
स्कूल से आने के बाद उन्हें अपनी मां के हाथ का खाना नसीब नहीं होता, हां फोन करके  मां हालचाल ज़रूर पूछ लेती है। शाम को मां उसके साथ खेल नहीं सकती, उसे रोज़ घूमाने नहीं ले जा सकती, यहां तक की उसके स्कूल के किस्से सुनने के लिए भी मां के पास व़क्त नहीं रहता. कभी-कभी अपनी इस बेबसी पर मां का दिल भी रोता है, कई बार मैंने भी महसूस किया अपनी मासूम बेटी की आंखों में मेरे लिए शिकायत, मगर चाहकर भी उसे दूर नहीं कर सकती।
अपनी तोतली भाषा में जब वो कहती है... तू आज ऑफिस नहीं जा रही न, तो दिल तो सचमुच करता न जाऊं, दिनभर उसे अपनी गोद में छुपाए रखूं, उसके साथ मस्ती करूं... पर ऐसा करना संभव नहीं हो पाता। वर्किंग होने का ख़ामियाज़ा मां की ममता से समझौते के रूप में भुगतना पड़ता है। आज सुबह ऑफिस के लिए निकलते व़क्त बेटी ने फिर पूछा ममा आप मुझे स्कूल से लेने आओगे ने? उसके इस मासूम सवाल का मुस्कुराकर जवाब देकर, उसके माथे को चूमकर मैं बस घर से निकल गई और मां के मन में फिर कश्मकश चलने लगी।

क्‍या प्‍यार अंतरंग पलों में ही सिमट गया है?



‘तुम्हारे पास पूरे परिवार के लिए व़क्त रहता है बस मेरे लिए ही नहीं रहता, अब तुम मुझसे प्यार नहीं करती। कितनी बदल गई हो तुम!  तुम्हें पति की कोई परवाह ही नहीं है, तुम्हारी प्राइऑरटी लिस्ट में मेरा नंबर शायद सबसे आखिर में है’।  शादी के बाद, खासकर बच्चे के जन्म के बाद एक पति को अपनी पत्नी से अक्सर ऐसी ही शिकायत रहती है। मेरे पति को भी हैं, बगैर कुछ सोचे-समझे पति महोदय की उलाहनाओं की लिस्ट लंबी होती जाती है और मैं बेचारगी की स्थिति में कई बार ये सोचने पर विवश हो जाती हूं कि क्या सचमुच मैंने कोई गलती कर दी है?  मगर मैं करूं भी तो क्या? वक्त ने जिम्मेदारियों का इतना लबादा ओढ़ा दिया है कि कभी आइने के सामने घंटों संवरने वाली लड़की, अब खुद को ठीक से आईने में निहार भी नहीं पाती। जब मेरे पास खुद अपने लिए ही वक्त नहीं है, तो कैसे मैं नवविवाहिता/प्रेयसी की तरह तुम्हारे गले में बांहों का हार डाले बैठी रहूं?
शादी के पहले तुम्हारे हाथों में हाथ डाले जब घंटों मैं बेफिक्र घूमती थी, तब मैं एक मां की दुलारी बेटी थी, हर जिम्मेदारी, चिंता-फिक्र से कोसों दूर। मगर अब बहू, पत्नी, मां, भाभी जैसे ढेरों रिश्तों में बंधी एक संपूर्ण स्त्री हूं, जिसके लिए अपनी इच्छा सबसे आखिर में आती है। परिस्थितियां बदली हैं, मैं नहीं, मगर तुम्हें कौन समझाए? ऑफिस से घर तक के सफर में अब मैं तुमसे मिलने के रूमानी ख़्याल से रोमांचित नहीं होती, क्‍योंकि तब मुझे ये चिंता सताती है कि अरे! आज डिनर में क्या बनेगा, बेटे का होमवर्क कब करवाऊंगी, कल ऑफिस में प्रेजेंटेशन देनी है उसकी प्रैक्टिस नहीं की तो मेरा प्रमोशन रुक जाएगा। सासू मां को डॉक्टर के पास ले जाना है। लॉन्ड्री में कपड़े देने हैं और ऐसे ही ना जाने कितने काम जिसे गिनाने बैठूं तो शायद पन्ना यूं ही भर जाए। अब मैं बिंदास बेटी नहीं, बल्कि रिश्तों के बंधन में बंधी बहू हूं। मगर आप तो कल जैसे बेफिक्र बेटे थे आज वैसे ही बेफिक्र पति। आपकी जिंदगी में तो कुछ नहीं बदला। वही परिवार, वही घर, वही दिनचर्या, मगर मेरी तो पूरी दुनिया ही बदल गई, तुम क्यों नहीं समझते हालात के इस बदलाव को?

मेरे ऊपर उंगली उठाने से पहले जरा अपने जेहन में झांककर देखो, कितने वादे किए थे तुमने मुझसे। हम दोस्त की तरह रहेंगे, हर काम मिलकर करेंगे, क्या हुआ उन वादों का? बच्चे की जिम्मेदारी मेरी, किचन भी मेरे हिस्से, आपके कपड़े-जूते सहेजना भी मेरे जिम्मे, आपके माता-पिता की देखभाल भी मेरे जिम्मे फिर कैसी बराबरी, कैसी साझेदारी?
तुम मायके मत जाओ आज मेरी दीदी/बुआ आ रही हैं। अपने दोस्तों से मिलने आज मत जाना आज मेरे ऑफिस की पार्टी में चलना है। हर वक्त समझौता भी मैं ही करूं?  मगर आपने कब मेरे बारे में सोचा? कब ये सोचा कि पत्नी भी तो नौकरी करती है, फिर घर आकर इतना काम, बच्चे की जिम्मेदारी भी उठाती है, वो भी तो थक जाती होगी, क्यों न आज उसकी थोड़ी मदद ही कर दूं ताकि उसे भी थोड़ा आराम मिल जाए। एक प्रेमिका से किए वादे पत्नी बनते ही बिसरा दिए आपने और फिर शिकायत करते हो कि तुम बदल गई!
हर जिम्मेदारी निभाने के बाद थकान से चूर-चूर हो चुके शरीर ने अगर रूमानी होने से इनकार कर दिया, तो क्या ये गुनाह है? जब ऑफिस के तनाव के कारण मुझसे बात किए बगैर तुम मुंह फेरकर सो जाते हो, तो क्या मैंने शिकायत की? क्या प्यार के मायने बस उन अंतरंग पलों तक ही सीमित होते हैं? खुद का अस्तित्व भुलाकर तुम्हारे परिवार में पूरी तरह से रम जाना, सबकी देखभाल में खुद को भूल जाना, सबको खिलाकर आखिर में खाना, तुम्हारी हर जीत पर खुश होना और हार पर मायूस होना...इसे क्या कहते हैं?

तुम और मैं नहीं, हम से घोले रिश्ते में प्यार की चाश्‍नी..!



कभी बस स्टॉप, तो कभी समुद्र किनारे, कभी किसी बागीचे में फूलों के बीच एक गुलाब लिए जिसका इंतज़ार किया करते थे, आज वही गुलाब के कांटों की तरह क्यों चुभने लगा है?, जिसकी आंखों की शरारत और मधुर मुस्कान मर मिटने का मन होता था, आज उसकी हर बात में कड़वाहट क्यों नज़र आती है?
कैसे बदल गए वो, कैसे बदल गई मैं?
अक्सर फुर्सत के पलों में संजना अतीत की उन मधुर स्मृतियों में खो जाती, जिन्हें याद करके आज भी उसकी हिरणी जैसी आंखें शर्म से झुक जाती, मगर दूसरे ही क्षण वर्तमान का एहसास उसे दुखी कर देता। कभी अपने प्यार के लिए पूरे परिवार से दुश्मनी मोल लेने वाली संजना और नीरज ने 3 साल पहले लव मैरिज की थी। दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि वो कभी टिपिकल पति-पत्नी नहीं, बल्कि दोस्त की तरह रहेंगे, हर काम मिल बांटकर करेंगे।
कुछ दिन तो सब ठीक रहा, मगर मर्द तो आख़िर मर्द ही होता है, वो भी हमारे भारतीय पुरुष, जिन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि बेटा घर के काम तेरे जिम्मे नहीं है, तुझे तो बस पढ़-लिखकर कमाना है (आजकल की आधुनिक माएं इसकी अपवाद ज़रूर हैं, मगर उनकी संख्या गिनती में ही है।) अब जिस मर्द को बचपन से ही ये सीख जन्मघुट्टी की तरह पिलाई जाए, भला उसका असर इतनी जल्दी कैसे ख़त्म हो सकता है?
धीरे-धीरे उनके रिश्ते में भी अहं आ ही गया। पति को लगने लगा कि हमेशा वो क्यों संजना के काम में हाथ बंटाए?  घर का काम तो औरतों की ही ज़िम्मेदारी है, ऐसे में अगर संजना ऑफिस से आने के बाद किचन की ज़िम्मेदारी उठाती है, तो इसमें ग़लत क्या है?  पति में आए इस बदलाव को संजना भी पचा नहीं पा रही थी, वो भी वर्किंग है, पति जितना ही कमाती है, व़क्त आने पर उसकी आर्थिक मदद भी करती है, तो यदि घर की ज़िम्मेदारी उठाने में उसने पति का सहयोग मांगा तो इसमें क्या बुरा है? बस फिर क्या था, अक्सर दोनों के बीच कहासुनी हो जाती, ‘ये तुम्हारा काम है मैं क्यूं करूं?  तुम अपना काम ख़ुद किया करो। ये मेरा नहीं तुम्हारा है। ऐसे ही दोनों एक-दूसरे पर शब्दों के बाण चलाते रहते। अपने बीच आई इस दरार से दोनों ही आहत थे, मगर दोनों का अहं उन्हें झुकने नहीं दे रहा था।
दरअसल, पुरुषों को ये समझना होगा कि औरतें भी इंसान होती हैं, उनके पास भी दो ही हाथ-पैर हैं, तो एक साथ ही वो परफेक्ट पत्नी और परफेक्ट वर्किंग वुमन के खाके में फिट नहीं बैठ सकती। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। यदि आपको स्मार्ट और कामकाजी पत्नी चाहिए, तो ख़ुद आपको पुरुषों के परंपरावादी चोले से बाहर निकलकर हालात को समझना होगा। गृहस्थी की गाड़ी बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ाने के लिए तुम ये काम कर लो कि बजाय, चलो हम ये काम कर लेते हैं, वाला रुख अख़्तियार करना होगा।
ऑफिस में बॉस ने डांट दिया या किसी कलिग से बहस हो जाने पर कैसे घर आने पर आपका मूड बिल्कुल ख़राब रहता है और कुछ काम करने का मन नहीं होता, वैसा ही पत्नी के साथ भी तो होता होगा? उस पर आपकी फरमाइशों की लंबी फेहरिस्त सुनकर क्या उसका ग़ुस्सा होना लाज़मी नहीं है? आपके उदास होने पर वो पूछती है, क्या आज ऑफिस में कुछ हुआ है क्या? मगर उसके उतरे चेहरे और बुझी-बुझी आंखों की तरफ़ देखे बिना आप ऑर्डर कर देते हैं, मुझे तो आज बिरयानी ही खाना है? ये भी नहीं सोचते कि उसकी मानसिक स्थिति कैसी है? क्या ये बेहतर नहीं होता कि दोनों में से जो जल्दी घर आ जाएं, वो किचन का मोर्चा संभाल ले या फिर बाकी के काम कर ले?
जब दोस्तों के बीच मेरी पत्नी तो फलां कंपनी में मैनेजेर है कहकर आप अपनी कॉलर टाइट करते हैं, तो आपका सिर गर्व से ऊंचा करने वाली पत्नी के काम में हाथ बंटाना क्या आपका फर्ज़ नहीं है?
मोहमम्द रफी का गाया फिल्म नया दौर का ये गाना साथी हाथ बढ़ाना... को यदि कभी-कभार आत्मसात कर लें, तो शायद उनके रिश्तों में तुम और मैं की कड़वाहट की जगह हम की चाशनी घुल जाएगी।

मॉर्डनिटी की डींगे बनाम लड़के की चाहत..!


डींगे हांकने के लिए होती हैं और मोह तो दिल को बाहर उछालने के लिए होता है, वो भी बल्लियों तक। अब मोह पैरों में मेंहदी लगाकर तो बैठता नहीं कि दिल में बस बैठा ही रहे। ऊपर से मोह यदि वंश बढ़ाने का हो और लड़का हो जाए, तो फिर क्‍या कहने! ऐसा उछाले मारना शुरू करता कि उस उछाल के क्‍या कहने! दिल बल्लियों उछलता है और डींगों को हांकने लायक छोड़ देता है। डिंगों की बड़ी किरकिरी होती है।
अब देखिए न!  वर्मा जी के यहां लड़का हुआ, तो उनका दिल बल्लियों उछला, इतना कि पहली बार जब वे दादा बनें तो भी न उछला था। भई पोता जो हुआ था। उनके वंश को बढ़ाने वाला। अब भले ही वे प्रोफेसर थे और स्‍त्री मुक्ति और पितृसत्‍तात्‍म्‍क समाज पर गजब लिखते और बोलते थे। यही हाल उनकी कार चलाने वाली पत्‍नी सामाजिक कार्यकर्ता मिसेज वर्मा का भी था। हालांकि ये और बात है कि जब पहले उनके बेटे को दो लड़कियां हुईं थी, तो उन्‍होंने नई नवेली दुल्‍हन की तरह ही रिएक्‍शन दिया था।
ओह! विनीत को लड़की हुई है..!
मिस्‍टर वर्मा और मिसेज वर्मा की लड़के और लड़की में भेद करने की डींगे हांकने वाली ही रहीं और उनका वंश बढ़ाने का मोह हर तरह की मॉर्डनिटी से हार गया।
अब देखिए न! हाल ही में मुझे अपनी एक दोस्त के मां बनने की ख़बर मिली। हालांकि ये उसका दूसरा बच्चा था!  मगर परिवार वालों की ख़ुशी और उतावलापन देखकर मैं हैरान थी। सबके सब ऐसे ख़ुश हो रहे थे, मानों उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो। मैं ये नहीं कह रही कि दूसरे बच्चे के जन्म पर ख़ुशियां नहीं मनानी चाहिए,  मैं तो बस ये समझने की कोशिश कर रही हूं कि समानता की बात करने वाली आज की युवा पीढ़ी भी लड़के-लड़कियों में फर्क़ कर ही देती है, तभी तो आज से 4 साल पहले जब मेरी दोस्त को लड़की हुई थी, तब परिवार में सबका चेहरा मायूसी से लटका हुआ था। वो बच्ची परिवार का पहला बच्चा था, सो सबको ख़ुशी से उसका स्वागत करना चाहिए था, मगर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि बाद में सब उस बच्ची से बहुत प्यार करने लगे, मगर उनके दिल के कोने में लड़के की चाहत बरक़रार रही।
 ‘अरे भई वंश बढ़ाने वाला कोई तो चाहिए, लड़की तो अपने घर चली जाएगी तब बुढ़ापे में कौन हमारी देखभाल करेगा,’ ये किसी बुज़ुर्ग महिला/पुरुष के विचार नहीं है, बल्कि मेरी दोस्त के पति जो ख़ुद प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर और आधुनिक युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका है।
हम आधुनिकता की कितनी भी डींगे हांक लें, लेकिन ये कड़वा सच है कि कुछ अपवादों को छोड़कर आज भी लोग बेटे की ही चाहत रखते हैं। सिंगल चाइल्ड के इस दौर में जहां काम की व्यस्तता और बढ़ते ख़र्च की वजह से जब कपल्स एक ही बच्चे को प्राथमिकता दे रहे हैं, यहां भी विरोधाभास ही नज़र आता है। यदि किसी दंपती को पहला लड़का हो गया फिर तो ठीक है, मगर पहली यदि बेटी हो गई, तो उन्हें सेकंड के बारे में सोचना पड़ता है। अगर कभी पत्नी दूसरा बच्चा न भी चाहे तो पति या परिवार वाले मानसिक रूप से उस पर दबाव बनाने लगते हैं, क्योंकि वर्किंग/शिक्षित बहू पर पहले की तरह शारीरिक जोर-ज़बर्दस्ती करना तो अब संभव नहीं रहा, लेकिन मानसिक तौर पर तो परेशान किया ही जा सकता है।
मुझे ताज्जुब तो इस बात का है कि ख़ुद आज के युवा अपने माता-पिता का ख़्याल नहीं रख रहे और उम्मीद करते हैं कि बेटा रहेगा तो उनका बुढ़ापा सुरक्षित रहेगा। लगता है ये लोग, ‘बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होए’ वाली कहावत भूल चुके हैं। ज़रा कोई इनसे पूछे कि भई जब तुम पैदा हुए होगे तो तुम्हारे मां-बाप ने भी तो ऐसा ही सोचा होगा न कि मेरा बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा, तो आज क्यों उन बेबस मां-बाप को अपने हाल पर अकेला छोड़ दिया। कुछ बच्चे तो बेझिझक माता-पिता को वृद्धा आश्रम छोड़ आते हैं, अगर आप अपने आसपास नज़र दौड़एंगे तो ख़ुद ही ऐसे ढरों उदाहरण मिल जाएंगे, जहां बेटा ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी रहा है और उसके लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान करने वाले माता-पिता बस किसी तरह अपनी ज़िंदगी के दिन काट रहे हैं।
मैं ये नहीं कहती कि सब बेटे एक जैसे होते हैं, मगर ज़्यादातर का हाल यही है, और जहां तक लड़के-लड़कियों का सवाल है तो पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों की ज़रूरत पड़ती है। बेटे की चाह रखने वालों से ज़रा पूछा जाना चाहिए कि अगर कोई बेटी पैदा ही न करे, तो भविष्य में आपके आंगन में बहू कैसे उतरेगी?  धूमधाम से किसके घर अपने बेटे की बारात ले जाओगे, बिना स्त्री के क्या किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?  शायद नहीं। मगर इतनी अहम् होने के बावजूद आज भी वो दोयम दर्जे की ही कहलाती है।
चाहे आईएस की परीक्षा हो, या कोई अन्य परीक्षा, लड़कियां कहीं भी लड़कों से पीछे नहीं है, तो जब हर जगह वो लड़कों की बराबरी कर सकती है, तब समाज क्यों नहीं उन्हें बराबर का दर्जा देता? क्यों लड़की होने पर किसी बहू को दूसरा बेटा पैदा करने के लिए मजबूर किया जाता है। वंश चलाने के लिए बेटा ज़रूरी है, ये तर्क देने वाले लोग क्या ये बता सकते हैं कि क्या अकेले बेटा ही उनका वंश चला लेगा बिना बहू के? आज के ज़माने में बेटियां बेटों से कम थोड़े ही हैं, स़िर्फ ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा, अगर सचमुच आप उन्हें बराबर मानते हैं, तो उनके जन्म पर भी वही ख़ुशी व उत्साह दिखाइए जितनी बेटे के जन्म पर दिखाते हैं।

तो क्‍या इन लोगों ने बनाया एक सामान्‍य महिला को राधे मां?  



राधे-राधे जपो चले आएंगे बिहारी..!  अब शायद लोग राधे-राधे जपने से पहले भी सौ बार सोचेंगे, कहीं ऐसा करने से उन्हें भी राधे मां का भक्त न मान लिया जाए। इन दिनों राधे मां पूरे देश के लिए हॉट टॉपिक बनी हुई हैं, और हो भी क्यों न लाल रंग में लिपटी वो हमेशा ख़ुद को यही तो दिखाने की कोशिश करती हैं। लाल रंग भक्ति या श्रद्धा का रंग नहीं है ये तो आप भी जानते ही होंगे। वैसे हाथ में त्रिशूल, उंगलियों में डिज़ाइनर रिंग, गले में चमचमाते हार, होठों पर लाली, भारी-भरकम लाल परिधान पहने अपने चेले-चपाटों से घिरी नाज़ो-नख़रे करते धीमे-धीमे क़दम बढ़ाती चलती राधे मां के जलवे किसी महारानी से कम नहीं हैं।

नख से लेकर शिख तक लाल रंग के परिधान और मेकअप में डूबी हुई राधे मां अब सचमुच में देवी का अवतार हैं या नहीं इसका फैसला तो वे ही करें जो उनके भक्‍त हैं, मगर इतना तो है कि उनमें गजब की शक्ति व आकर्षण है, तभी तो एक से एक नामचीन लोग भी उनकी भक्तों की लिस्ट में शामिल हैं।
एक साधारण महिला, जिसे शायद ठीक से बोलना भी नहीं आता, तभी तो लाल परी राधे मां हमेशा बड़ी-सी झूठी मुस्कान के आवरण से अपनी अज्ञानता छिपाने की कोशिश में लगी रहती हैं। वैसे एक बात तो है ये राधे मां जितनी बड़ी ड्रामा क्वीन है, हमारे देशवासी उतने ही बड़े मूर्ख हैं। समझ नहीं आता कि मेकअप से पुती इस महिला में उन्हें कैसे और कहां से देवी का अवतार नज़र आता है?  आख़िर उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि लोग अपने आंख-कान और दिमाग़ बंद करके उसके पीछे हो लिए?
अब तक टीवी पर जितनी बार भी माता जी ने दर्शन दिए, कहीं से वो साधु-संत या देवी का आभास नहीं कराती हैं। बाकी ढोंगी बाबाओं ने तो चलो अपने बोलबचन से लोगों को अपने वश में किया या मूर्ख बनाया, मगर ये मैडम तो उनसे कहीं आगे निकल गई। बिना बोले स़िर्फ अपनी फरेबी मुस्कान की बदौलत उसने अपने इतने भक्त बना लिए कि उनके चढ़ावों ने ग़रीब सुखविंदर कौर को करोड़पति राधे मां बना दिया। सचमुच ग़जब का हुनर है इनमें। वैसे इनसे ज़्यादा तारीफ़ के क़ाबिल तो इनके वो भक्त हैं, जो आंखें होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं करते। हाथ में त्रिशूल लेकर पागलों की तरह नाचना, गहनों से लदे रहना, आशीर्वाद के नाम पर किसी की गोद में चढ़ जाना या किसी को गले लगाना... भला भक्ति का ये कौन-सा रूप है?
साधु-संत तो भोग-विलास से कोसो दूर प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं, मगर ये मां तो विलासिता की जीती-जागती मिसाल है। हमारे देश कि ये विडंबना ही है कि ख़ुद को महाशक्ति और आधुनिक बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद हम अंधविश्‍वास की मज़बूत पकड़ को ढीली नहीं कर पाए हैं। आज भी अंधविश्‍वास की जड़े इतनी गहरी तक जमी है कि उसे निकाल पाना सरकार और प्रशासन के बस की बात नहीं। जब भी किसी तथाकथित धर्म गुरु का पर्दाफाश होता है तो उसकी गिरफ्तारी की राह में उसके भक्त दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं।  आशाराम और संत रामपाल मामला इसकी मिसाल रहे हैं।

दरअसल, हमारे देश में इन बाबाओं की दुकानों के फलने-फूलने का स्वार्थ, अंधविश्‍वास, लोगों में आत्मविश्‍वास की कमी, सब कुछ जल्दी पा लेने की चाह, मेहनत किए बिना सब पा लेने की ख्वाहिश... सब ज़िम्मेदार है।  आप ही बताइए अगर आप और हम किसी भी ऐरे-गैरे को देवी, भगवान का अवतार मानना बंद कर दें, तो क्या वो इतना मशहूर हो सकता है?  आशाराम, रामपाल, निर्मल बाबा, राधे मां और इनके जैसे और न जाने कितने ढोंगी संत हर गली-कूचे में पनपते रहते हैं। इनकी वेबसाइट बनाकर बक़ायदा इनका गुणगान किया जाता है इनका बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए आपसे दान के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं, इनके आशीर्वाद के लिए ऑनलाइन बुकिंग होती है।
अब बताइए, क्या भगवान इतने सस्ते हो गए हैं कि उन्हें भी ऑनलाइन मार्केटिंग की ज़रूरत पड़ गई? जब तक हम और आप इन जैसे लोगों के झांसे में आते रहेंगे तब तक राधे मां और आसाराम जैसे लोगों की नई जमात तैयार होती ही रहेगी। एक जाएगा तो दूसरा आएगा, क्योंकि इनके जैसे ढोंगियों को पनपने के लिए हमारे पास अंधविश्‍वास और स्वार्थ का खाद पानी जो है।

..तो इस चीज का नशा था ‘इंद्राणी’ को..?

कुछ साल पहले एक चौदह वर्षीया लड़की (आरुषि) की निर्मम हत्या का मामला सामने आने के बाद पूरे देश में सनसनी फैल गई थी। हर किसी की ज़ुबां पर इस हत्याकांड के चर्चे थे, वो इसलिए नहीं था कि ये हमारे देश का कोई पहला हत्याकांड हो, बल्कि इसलिए था क्योंकि इसमें हत्या का दोषी कोई और नहीं, बल्कि लड़की के अपने माता-पिता थे। अब वे वाक़ई दोषी हैं या नहीं ये, तो आज भी राज बना ही हुआ है हालांकि हैं फिलहाल दोनों जेल में। इस हत्याकांड के सामने आते ही सबसे विश्‍वसनीय माना जाने वाला बच्चे और मां-बाप का रिश्ता ही सवालों में घिर गया। क्या कोई माता-पिता अपनी ही औलाद को यूं मार सकते हैं?

अब कई सालों बाद एक बार फिर यही बहस शुरू हो गई है। ताज़ा मामला है शीना बोरा हत्याकांड का है, जिसकी गुत्थी मकड़ी के जाले से कम उलझी हुई नहीं है। इस केस ने तो सारे रिश्तों चाहे वो पति-पत्नी का हो या मां-बेटी का सबकी विश्‍वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यकीनन मां जो बच्चे की सरंक्षक होती है, अगर वही उसकी दुश्मन बन जाए, तो भला वो इस दुनिया का सामना कैसे करेगा? हमारी संस्कृति में मां को हमेशा सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया है, मगर इंद्राणी जैसी मां ने संसार के सबसे पवित्र और ख़ूबसूरत रिश्ते को कलंकित कर दिया है। ज़रा सोचिए ऐसी ख़बरों का बच्चों के मन पर क्या असर होता होगा?
किसी भी महिला का महत्वाकांक्षी होना और तरक्क़ी करना बिल्कुल भी ग़लत नहीं है, मगर ये किस क़ीमत पर? क्या किसी औरत की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ सकती है कि वो अपनी ही औलाद जिसे नौ महीने अपने ख़ून से सींचा हो, को इस बेरहमी से दुनिया से विदा कर दे और उस पर भी ख़ुद को बेगुनाह साबित करने के लिए नई-नई पैतरे बाज़ी करे। चेहरे पर बेटी को खोने का कोई ग़म, दुख नहीं।
मानना पड़ेगा इंद्राणी को। गजब के आत्मविश्‍वास और मज़बूत इरादों वाली महिला है वो। अगर अपनी इस ख़ूबी को इंद्राणी ने सही दिशा में इस्तेमाल किया होता, तो शायद वो लोगों की रोल मॉडल बन सकती थी, मगर दौलत और शोहरत की अपनी भूख मिटाने के लिए उसने जिस तरह से रिश्तों का खेल खेला है, हर रिश्ते में विश्‍वास को तार-तार किया है, लोगों का तो ख़ून के रिश्तों पर से ही विश्‍वास उठ जाएगा।
बड़े-बड़े महलनुमा घरों व लग्ज़री कारों में चलने वाली उच्‍च तबके की महिलाओं को देखकर लगता है कि शायद इनके जीवन में कोई कमी नहीं है, ये बहुत सुखी होंगी, क्योंकि इनके पास ढेर सारे पैसे हैं, तो ये कुछ भी ख़रीद सकती हैं। मगर हक़ीकत तो ये है कि जो जितना अमीर है उतना ही डरा हुआ रहता है, उसे दौलत-शोहरत छिन जाने का डर सताता रहता है। इन्हें प्यार, अपनापन, रिश्ते-नाते मिडिल क्लास मेंटैलिटी की बात लगती है। ये अपने बच्चों को महंगे-महंगे खिलौने तो दे देंगी, मगर अपना समय और प्यार नहीं दे सकतीं, क्योंकि इन्हें किसी क्लाइंट के साथ मीटिंग में जाना होता है या फिर कोई पार्टी इनका इंतज़ार कर रही होती है।
हर चीज़ को पैसों के तराज़ू में तौलने वाले ऐसे लोगों की ज़िंदगी सब कुछ होते हुए भी पूर्ण नहीं होती, क्योंकि और, और, और ज़्यादा पाने की इनकी भूख इन्हें संतुष्ट नहीं होने देती। और ज़्यादा की अपनी चाह को पूरा करने के चक्कर में इनके पास जो चीज़ हैं वो उसका भी लुत्फ़ नहीं उठा पाते। सारी सुख-सुविधाएं होते हुए भी सुकून से सहज ज़िंदगी नहीं जी पाते। रिश्तों और इंसानियत से दूर होते ऐसे लोग जल्दी ही किसी मशीन में तब्दील हो जाते हैं, जिनका मकसद स़िर्फ और स़िर्फ बैंक बैलेंस बढ़ाना होता है।

अब जब इंसान का दिल ही मशीनी हो जाए, तो उससे भला आप किसी तरह की भावनाओं और संवेदनाओं की अपेक्षा कर सकते हैं। आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा, बी प्रैक्टिकल, डोन्ट बी इमोशनल फूल, जिन लोगों के लिए भावनाएं बेवकूफ़ी होती हों उनसे प्यार और अपनेपन की उम्मीद करना बेमानी ही होगी। शायद ये प्रैक्टिकल होने का ही नतीजा है कि रिश्तों से संवेदनाएं दूर होती जा रही हैं।
निश्चित ही रिश्ते तो हैं, मगर उनमें जुड़ाव और गहराई नहीं है। वो थोथे चने की तरह खोखले हो चुके हैं।  पति-पत्नी, मां-बाप व बच्चे, भाई-बहन हर वो रिश्ता जो पहले विश्‍वास और सुरक्षा की गारंटी होता था, उसकी बुनियाद खोखली होती जा रही है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए बहुत ख़तरनाक है. अब इंद्राणी मुखर्जी दोषी हैं या नहीं ये फैसला तो अदालत करेगी, मगर अब तक उससे जुड़ी जितनी जानकारी सामने आई है, उससे वो रिश्तों की बड़ी सौदागर से कम नहीं लगतीं।

Wednesday, September 9, 2015

साड़ी पहनना सभ्‍यता है और शॉर्ट स्‍कर्ट..?



आज सुबह रोज़ाना की तरह लोकल ट्रेन में दो महिलाओं की आपसी बातचीत हो रही थी,  तभी शॉर्ट ड्रेस पहने एक सुंदर सी लड़की उनके सामने आ गई।  उसे देखते ही दोनों अधेड़ उम्र महिलाएं उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगी।
दरअसल, वो उसकी छोटी स्कर्ट के नीचे से झांकती ख़ूबसूरत टांगों को देखकर चिढ़ भी रही थी, कि हाय! कितनी सुंदर है और बदन दिखाने के लिए आपस में मिलकर उसे कोस भी रही थी - आजकल की लड़कियों को कपड़े पहनने का ढंग ही नहीं है, पता नहीं शरीर ढंकने के लिए कपड़े पहनती हैं या दिखाने के लिए? अब ऐसे कपड़े पहनकर सड़क पर निकलेंगी तो लड़के छेड़खानी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे? काफ़ी देर तक ये दोनों मोहतरमा इसी तरह उस लड़की के पहनावे का पोस्टमार्टम करती रहीं। दिलचस्प बात तो ये रही कि उस लड़की को बदन दिखाने के लिए कोसने वाली दोनों महिलाओं कहने को तो साड़ी पहनी थी, मगर डीप नेक ब्लाउज़ और बेतरतीब ढंग से पहनी साड़ी में उनका बदन भी ढंका कम ही था, मगर चूंकि उन्होंने साड़ी पहनी है, इसलिए वो सभ्य हैं।
इन महिलाओं की बातें सुनकर मुझे हैरानी नहीं हुई, क्योंकि अक्सर इस तरह की बातें हर जगह सुनने को मिल ही जाती है। जब कभी कहीं महिलाओं के साथ बर्बरता की कोई ख़बर सुर्ख़ियों में आती है, तो बिना कुछ जाने-समझे-सोचे फट से लोग (जिसमें आम से लेकर ख़ास सब शामिल रहते हैं) कह देते हैं इतने छोटे कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत थी, अब ऐसे तंग कपड़ों में घूमेगी तो ऐसा तो होना ही था। कमाल कि बात है एक तरफ़ तो हम मॉर्डनिटी और खुले विचारों की बात करते हैं यानी हर किसी को अपनी पसंद से जीने, खाने-पीने, पहनने का हक़ है और दूसरी तरफ़ कभी कॉलेज में लड़कियों के लिए ड्रेस कोड लागू किया जाता है, तो कभी उनके जींस पहनने पर पाबंदी लगाई जाती है। ये कैसी मॉडर्निटी है?
जब लड़के शॉर्ट्स और बनियान में घूमते हैं या कई बार बनियान उतार भी देते हैं तो क्या कभी किसी ने ये सुना कि लड़कियों ने उनके साथ छेड़छाड़ की? या उन्हें अश्‍लील कहा गया? शायद... शायद क्यों, निश्‍चय ही नहीं..!  ऐसा उनके लिए कभी नहीं कहा जाता, क्योंकि हमारे समाज ने शालीनता के सारे नियम स़िर्फ और स़िर्फ महिलाओं के लिए ही बनाए गए हैं। पुरुष तो इस नियम की परिधि से पहले भी बाहर थे और अब भी।
इस मामले में एक और बात जो हैरान करती है कि लड़कियों के पहनावे पर कमेंट करने वाले कई अधेड़ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी ख़ुद की बेटियां भी आधुनिक लिबास ही पहनती हैं, मगर दूसरी लड़कियों/महिलाओं को शालीनता का पाठ पढ़ाने वाले ऐसे लोग वो नियम अपने घर की बेटियों पर लागू नहीं करतें यानी हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। मैं ये नहीं कहती कि आज़ादी के नाम पर लड़कियां कपड़े उतारकर घूमें, मगर वो क्या पहनेंगी और क्या नहीं ये उन्हें ही डिसाइड करने दीजिए। जिस तरह महिलाएं पुरुषों के पहनावे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करतीं, उसी तरह पुरुषों को भी इससे दूर ही रहना चाहिए। जहां तक उनके साथ छेड़खानी का सवाल है, तो ये कपड़ों की वजह से नहीं, बल्कि गंदी मानसिकता का नतीजा है। यदि स़िर्फ मॉर्डन कपड़े ही ज़िम्मेदार होते तो कोई साड़ी/सलवार-कमीज़ पहनी महिला से बदतमीज़ी नहीं करता, छोटी-छोटी मासूम बच्चियों को अपनी हैवानियत का शिकार नहीं बनाता।
हाल ही में मुबई की लोकर ट्रेन में किसी मनचले एक लड़की से रेप की कोशिश की, उसके कपड़े फाड़ डाले। हालांकि लड़की के शोर मचाने पर वो वहां से भाग खड़ा हुआ। अगर गौर करें तो इस तरह की जितनी भी वारदातें होती हैं उसके पीछे कपड़े नहीं, बल्कि बीमार और विकृत मानसिकता होती है। लड़कियों को लिबास बदलने की सलाह देने वालों क्यों नहीं इस पुरुषवादी समाज को अपने विचार बदलने की सलाह देते हैं?

सिंदूर, बिंदी और मंगलसूत्र का मोहताज नहीं है पत्‍नी का रिश्‍ता..!  



मांग में सिंदूर भरे माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाए, पायल छमकाती मिसेज खन्ना अपनी पड़ोसन से शिकायत करने पहुंची थी। अपनी नई नवेली देवरानी की। दरअसल, मिसेज़ ख़न्ना उन महिलाओं में से हैं जिनके लिए रिश्ते निभाने का मतलब है उससे जुड़ी हर मान्यता, रीति-रिवाज़ और निशानियों को तहे दिल से मानना।
हालांकि ऐसा नहीं है कि वो शिक्षित नहीं हैं। मिसेज़ ख़न्ना ग्रैज्युएट हैं, मगर पत्नी धर्म के मामले में उनकी राय किसी भी 70-80 साल की बुज़ुर्ग महिला से अलग नहीं है, जिनके लिए पति परमेश्‍वर हैं और उस परमेश्‍वर का नाम लेना भी गुनाह है। उन्हें तो बस ऐजी, ओजी, सुनिए जी या फलां के पापा जैसे संबोधनों से ही बुलाया जा सकता है। अन्यथा भगवान नाराज़ हो जाएंगे। ये बातें आज की मॉर्डन महिलाओं को बहुत बचकानी लग सकती हैं, मगर ये सच हैं।
हां, तो बात हो रही थी मिसेज़ खन्ना की, जो अपनी नई-नई देवरानी के चाल-चलन से दुखी थीं। हुआ यूं कि उनकी देवरानी प्रिया एमबीए थी और मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत थी, शादी के बाद भी बाक़ायदा उसने नौकरी जारी रखी। चूंकि वो मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हैं तो ज़ाहिर है कि उसका ड्रेस कोड भी उसी के मुताबिक़ होगा, बस यही बात मिसेज़ खन्ना को खल गई। कल की आई देवरानी उनके सामने
wife
कोर्ट-पैंट, ट्राउज़र-शर्ट पहने, बिना कानों में झुमके, बिना पायल-बिछुए, बिंदी और मंगलसूत्र पहने रोज़ाना इसी तरह बिंदास ऑफिस जाने लगी, तो उनके दिल पर सांप लोटने लगे। कैसी बदतमीज़ लड़की है, इसे तो अपने संस्कारों का ज़रा भी ख़्याल नहीं। शादी हुए महीना भर नहीं बीता की मैडम ने सारे सुहाग चिन्ह उतार दिए। इसे अपने पति की ज़रा भी परवाह नहीं। इस तरह सुहाग चिन्ह उतारने से कहीं पति पर कोई संकट आ गया तो, उस परकटी को तो इसकी भी चिंता नहीं है।
हद तो ये है कि अपने पति को भी नाम से बुलाती है। एक बार मैंने उसे समझाने कि कोशिश की कि हमारे धर्म में पति को नाम से नहीं बुलाते हैं, इससे उनकी उम्र कम हो जाती है, तो ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए बोली, ‘भाभी आप भी किस ज़माने की बात करती हैं, ये सब झूठी बाते हैं। हाय राम! मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि अब हमारे घर का क्या होगा? अपनी ऐसी ही कई चिंताएं मिसेज़ खन्ना अपनी पड़ोसन से शेयर करती रहीं। वो पड़ोसन को बताती हैं कि कई दफ़ा उन्होंने प्रिया (देवरानी) को इन सबके लिए टोका भी, मगर उसने हमेशा बड़ी ही शांति से उन्हें समझाने की कोशिश की कि उसके लिए ये सारी निशानियां पहनना संभव नहीं है और उसे नहीं लगता कि स़िर्फ चूड़ी, बिंदी और बिछुए पहनने से ही वो सुहागिन या पत्नी का धर्म निभाएगी।
प्रिया की तरह ही बहुत-सी महिलाएं है जिन्हें पतिव्रता कहलाने के लिए निशानियों में बंधना ज़रूरी नहीं लगता, मगर इनकी चाची, मौसी और पड़ोस की काकी को इससे बड़ी आपत्ति है। कलयुग है भई! आजकल की लड़कियां सुहाग चिन्ह भी नहीं लगाती, पति की कोई इज्ज़त भी नहीं करती हैं। अब भला इन काकी/चाची/मौसियों को कौन समझाएं कि आप तो पति के पैर दबाकर स़िर्फ कुछ देर के लिए उनकी शारिरिक थकान कम कर देती थीं, मगर ये तो पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं, उनका आर्थिक व मानसिक बोझ साझा करती हैं। एक दोस्त की तरह उन्हें समझाती है, उनसे सलाह लेती और देती हैं। वे बात-बात पर पति से साड़ी और गहनों की फरमाइश नहीं करती, बल्कि नया घर-गाड़ी ख़रीदने से लेकर घर चलाने और ईएमआई भरने में उनकी मदद करती हैं।

वैसे भी क्या हमारे देश में शादीशुदा पुरुषों के लिए क्या कोई निशानी अनिवार्य है? क्या वो कोई ऐसी चीज़ पहनते या लगाते हैं, जिससे उनके शादीशुदा होने का पता चले? नहीं है न, तो बंधन स़िर्फ महिलाओं के लिए ही क्यों? यदि किसी को इन सारी चीज़ों में ख़ुशी मिलती है तो वो इसे अपनाएं, लेकिन कोई महिला यदि इन निशानियों से दूर रहना चाहे, तो उसे भी इसकी आज़ादी होनी चाहिए। सुहाग चिन्हों के आधार पर उसके पत्नी धर्म को आंकना सही नहीं होगा। कई बार तो पति ख़ुद नहीं चाहते कि उनकी पत्नी टिपिकल महिलाओं की तरह मांग भर सिंदूर और पूरे हाथ में चूड़ियां पहने उनके साथ ठुमकती चले। वैसे भी पति-पत्नी का रिश्ता प्यार, विश्‍वास, आपसी समझ और समझदारी का होता है उसमें भला निशानियों का क्या काम?

‘नहीं दरकार मुझे झुमके, पायल, बिछुए, बिंदी, सिंदूर और मंगलसूत्र की, बस काफ़ी है मेरा प्यार उनके दिल में जगह बनाने के लिए।’