विचित्र है इंसान
विचित्र है ये दुनिया, विचित्र है इंसान
अब इनकी क्या सुनाए हम आपको दास्तान
करते थे जिसकी बुराईयां कभी, आज कर रहे हैं उनका ही गुणगान
समझ से परे होते हैं ऐसे इंसान
न होती है शर्म इनमें ना होता है इनका कोई इमान
खुद की अकल का पता नहीं और दूसरों को देते फिरते हैं ये ज्ञान
दिल में नफरत समेटे हुए जाने कैसे बिखेरते रहते हैं ये मुस्कान
देखकर इनको शायद सोचता होगा भगवान
आखिर कैसे हो गई भूल मुझसे
इंसान की शक्ल में मैंने भेज दिया शैतान
अब इनकी क्या सुनाए हम आपको दास्तान
करते थे जिसकी बुराईयां कभी, आज कर रहे हैं उनका ही गुणगान
समझ से परे होते हैं ऐसे इंसान
न होती है शर्म इनमें ना होता है इनका कोई इमान
खुद की अकल का पता नहीं और दूसरों को देते फिरते हैं ये ज्ञान
दिल में नफरत समेटे हुए जाने कैसे बिखेरते रहते हैं ये मुस्कान
देखकर इनको शायद सोचता होगा भगवान
आखिर कैसे हो गई भूल मुझसे
इंसान की शक्ल में मैंने भेज दिया शैतान
Comments
Post a Comment