Thursday, June 30, 2011

काम और बस काम...

काम काम और बस काम...
इस काम ने कर दिया हैं जीना मुहाल
सुबह से रात तक बस दिखता है काम
सुकून और चैन का न लो तुम नाम
लोग कहते हैं हम बने ही करने के लिए काम
कोई पूछे उनसे क्या हम नहीं हैं इंसान?
क्या हमे नहीं चाहिए कुछ पल का आराम?
ऑफिस के सिवा भी है एक दुनिया हमारी
क्या उसकी जिम्मेदारियां निभाना नहीं हैं हमारा काम?

सवालों का सिलसिला

भावहीन हो गयी है कविता, सारहीन गया है साहित्य
उद्देश्यहीन हो गयी पत्रकारिता और अर्थहीन हो गया है जीवन
क्या ये असर है विकास की अंधी दौर का?
या नतीजा है दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ने की होड़ का?
जज़्बात, प्यार, भावनाएं, विचार सिमट गये हैं बस शब्दों में
खलती है अब इनकी कमी जिंदगी में
क्या शोहरत की शोहबत ने कर दिया है क़त्ल हमारी संवेदनाओं का
या झूठी कामयाबी के खुमार में गुम हो गया असल मकसद जिंदगी का?
क्या यूँ ही जारी रहेगा सवालों का सिलसिला?
या मिलेगा कभी जवाब इनका?

Thursday, June 2, 2011

किसके लिए संजोते हो सपना , दुनिया की इस भीड़ में नहीं होता हैं कोई अपना.
देंगे दगा वही जिसे दिल में बसाते हो, करेंगे रुसवा वही जिनके लिए खुशियाँ जुटाते हो.
तुम पर नहीं, तुम्हारी शोहरत पर झुकते हैं लोग.
जो गिरोगे एक बार, तो रौंद कर निकल जायेंगे आगे .
भावना, प्यार, सम्मान का नहीं हैं यहाँ कोई मोल.
बस पैसो में तौले जाते हैं यहाँ रिश्तों के डोर.