Monday, July 26, 2010

खबरों का झूठा संसार

दिन ब दिन न्यूज चैनलों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है ये बात और है कि इस भीड़ में शामिल होने वाले नए चैनलों की सांसे ज्यादा लंबे समय तक चल नहीं पाती, और इससे पहले की लोग नए नवेले चैनल से वाकिफ हो ये दम तोड़ देते हैं... जिस रफ्तार से इनकी तादाद बढ़ रही है उतनी ही तेजी से वो अर्श से फर्श पर भी आ रहे हैं... ताश के पत्तों की तरह इनका अस्तित्व चंद महीनों में ही ढह जाता है...

दरअल, वर्तमान में न्यूज चैनल चलाना किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह ही हो गया है, ताज्जुब की बात तो ये है कि आजकल वो लोग भी चैनल खोल लेते हैं जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं होता... तभी तो ऐसे चैनल पर खबरों के नाम पर दिखाए जाते है फूहड़ मनोरंजन कार्यक्रम... अब अगर किसी एक चैनल ने कोई नया ट्रेंड शुरू किया तो सभी उसी का अनुसरण करने लगते हैं चाहे वो नए हों या पुराने... नए खुलने वाले चैनल तो खासतौर से नकल पर ही अपनी खबरों की दुकान चलाते हैं... आपको जानकर हैरानी होगी कि कई चैनल में काम करने वाले लोग तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी चीजों से भी अवगत नहीं होते... फिर भी उंचे ओहदे पर बैठे होते हैं...

ऐसा लगता है मानों खबरों की अंधी दौड़ में सब भागे जा रहे है इस बात की परवाह किए बगैर कि क्या उनकी दिशा सही है, क्या उनमें रेस लगाने की क्षमता है? बिना अपनी क्षमता का आकलन किए अगर कोई काम किया जाता है तो उसमें हार की संभावना ज्यादा रहती है...

जोश और जूनून में लोग चैनल तो खोल लेते हैं लेकिन न तो वो पत्रकारिता के साथ और ना ही पत्रकारों के साथ न्याय कर पाते हैं... पत्रकारिता के साथ न्याय नहीं कर पाते क्योंकि इनके मालिकों का मकसद किसी भी तरह से विचारपूर्ण पत्रकारिता का होता ही नहीं है, वो तो चैनल खोलते हैं ताकि इससे अपनी तिजोरी भर सके लेकिन अफसोस कि इनकी खबरों की दुकान की फिकी पकवान ग्राहकों यानी न तो दर्शकों और ना ही विज्ञापन कंपनियों को ही लुभा पाते हैं...

इस तरह की दिशाहीन और खोखली बुनियाद पर खुलने वाले चैनलों से अगर किसी का नुकसान हो रहा है तो वो हैं ऐसे चैनल में काम करने वाले कर्मचारियों का... पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने को व्याकुल युवा चैनल में नौकरी मिलने पर खुश तो बहुत होते हैं लेकिन जब चंद महीनों बाद ही चैनल की नींव डावाडोल होने लगती है तो फिर उन्हें अपने भविष्य की चिंता सताने लगती है... और वो कोसने लगते हैं कि किस मनहूस घड़ी में पत्रकारिता को पेशा चुनने की गलती कर बैठे...

कुछ चुनिंदा पुराने समाचार चैनलों को छोड़ दें तो आए दिन खुलने वाले नए चैनलों की न तो कोई टीआरपी होती है और ना ही ये किसी नियम का ही पालन करते हैं... ये जब चाहे तब कर्मचारियों को नौकरी से हटा देते हैं और कर्मचारी बस मूक दर्शक बना देखता रहता है यानी चैनल मनमानी करता रहता है और जनता को न्याय दिलाने की बात करने वाला पत्रकार खुद को ही न्याय दिला पाने में असमर्थ रहता है... पिछले कुछ साल में मीडिया जगत में जिस तरह का परिवर्तन आया है उससे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि इन चैनलों की चका चौंध चार दिन की चांदनी से ज्यादा कुछ नहीं है...इनकी हस्ती बस दो पल की होती है…

“ना कोई आचार है ना कोई विचार है ये तो बस खबरों का झूठा संसार है...”

दो पल की हस्ती

दो पल की है हस्ती

कल मिट्टी में मिल जाना है

जब तक है सांसे दुनिया की हर रीत निभाना है

मरने पर याद करे जमाना, कुछ ऐसा कर जाना है

नहीं रहेगी हस्ती मेरी तो क्या

लोगों के दिल में बस जाना है

दो पल की है हस्ती

कल मिट्टी में मिल जाना है

जीवन है जब तक अपनों से प्रीत निभाना है

दिल में हो सौ दर्द मगर फिर भी मुस्कुराना है

खुद जलकर मुझको दुनिया को रौशन कर जाना है

ज़िंदगी एक तलाश

ये ज़िंदगी एक तलाश है
किसी को नौकरी तो किसी को प्यार की आस है
खुशी की तलाश में हर कोई उदास है
यकीन रखों ख़ुद पे
एक दिन पूरी होगी ज़िंदगी की तलाश
और हर ख़ुशी होगी तुम्हारे पास

दायरा

हम भी उड़ सकते हैं आसमान में एक मौका तो दो
छू सकते हैं गगन की ऊचाइयों को पख फैलाने के लिए दायरा तो दो

Friday, July 23, 2010

हम भी उड़ सकते हैं आसमान मेंएक मौका तो दोछू सकते हैं गगन की ऊंचाईयों कोपंख फैलाने के लिए दायरा तो दो

खोखली बुनियाद

एक बार फिर वही नज़रा दिखा
चारो तरफ़ उदासी का साया दिखा
हर किसी की जुबां ख़ामोश थी
मगर आंखों मे ढेरो सवाल दिखें
अब डर लगता है ख़ामोशी से
हमें तो भीड़ में भी तन्हाई दिखी
बनाया था जिस इमारत को हमने बड़े नाज़ों से
आज उसकी ही बुनियाद क्यों खोखली दिखी?

विचित्र है इंसान

विचित्र है ये दुनिया, विचित्र है इंसान
अब इनकी क्या सुनाए हम आपको दास्तान
करते थे जिसकी बुराईयां कभी, आज कर रहे हैं उनका ही गुणगान
समझ से परे होते हैं ऐसे इंसान
न होती है शर्म इनमें ना होता है इनका कोई इमान
खुद की अकल का पता नहीं और दूसरों को देते फिरते हैं ये ज्ञान
दिल में नफरत समेटे हुए जाने कैसे बिखेरते रहते हैं ये मुस्कान
देखकर इनको शायद सोचता होगा भगवान
आखिर कैसे हो गई भूल मुझसे
इंसान की शक्ल में मैंने भेज दिया शैतान

कैसी है उलझन?

जाने क्यों उदास है मन, पाया है कुछ मैने लेकिन खुशी नहीं उसकी
गम है बहुत कुछ खोने का
रिश्ता पुराना तो नहीं पर गहरा बहुत है
वो मेरे अपने तो नहीं पर अपनों से कम भी नहीं हैं
जो चाहा नहीं था वो कर रही हूं
जो चाहा वो कर नहीं पाई
वक्त ले रहा है इम्तिहान हमारा
खड़े हैं हम दोराहे पर रास्ता चुन तो लिया है
फिर भी मन में है जाने कैसी उलझन

वक्त

वक्त भी क्या करवट बदलता है
आज उन गलियारों में खोमोशी का डेरा है
जहां कभी होता था खुशी का बसेरा
भीड़ की जगह एकांत है,
मन सवालों से अशांत है
हर तरफ अनिश्चितताओं को है अंधेरा
फिर भी मन में बस एक धुंधली सी उम्मीद है
कि वक्त शायद फिर ले कोई और करवट