Thursday, December 23, 2010

खामोशी

अब तो चुप्पी तोड़ो, ख़ामोश क्यों हो? कुछ तो बोलो,
लुट रहा है देश खुलेआम,
बिना रिश्वत के नहीं होता यहां कोई काम,
भ्रष्टाचारियों ने डुबो दी है देश की शान,
ठगा सा महसूस कर रहा है आम इंसान, हाय! किस पर करूं मैं विश्वास.
दो वक़्त की रोटी मुश्किल हो गई है गरीबों की
और तिजोरी भरती जा रही अमीरों की.
घोटालों की घुटन में कहीं घुट न जाए देश,
इसलिए अब तो मन को टटोलो जी
अब तो कुछ बोलो मनमोहन जी.

Wednesday, December 22, 2010

उम्मीदों का आसमां बहुत बड़ा है, हकीकत का धरातल है छोटा
रिश्तों की गहराई बहुत है, मगर साथ है छोटा.